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Thursday, February 5, 2015

दर्द की एक नदी
मुझसे  हो कर गुजरती है
कतरा कतरा मरता मेरा वजूद
उसमे घुलता जाता है
नदी की मछलिया
बहुत उदास है
आज भी अक्सर
सुनाई देती है उनके रोने की आवाजे
-०-
सूरज उतरता है नदी में
लहरो से करता है बातें
कुछ दुःख की कुछ सुख की
शर्म से लाल होती हैं लहरें
किनारों को पसंद नहीं सूरज का आना
वो  सिमटने लगता है
सुना है अब वहाँ नदी नहीं
बस एक धारा बहती है
-०-
मोहब्बत की
 पुरानी पड़ती परिभाषाएं
दीमक लगते बिम्ब
पीली पड़ती उपमाओं से अलग
कुछ लिखना चाहा
तो शब्दों ने बगावत करदी
बोले
नए रूप में
मै खुद ही नहीं पहचान  पाऊँगा
वैसे भी
मेरी जड़ों मेँ दीमक लगने लगा है
-०-
प्रेम  के चौखट पर
खिला रहता था एक लाला गुलाब
न जाने क्यों
वो धीरे धीरे काला होने लगा
हरी पत्तियां
भूरी हो गयीं
कहते हैं उसकी ज़ड मेँ
शक के कीड़े को घुसते देखा गया
-०-
चौराहे पर पड़ा
प्रेम बीज
खिलने की हसरत लिए
करता रहा स्नेह की नमी का इंतजार
और दम तोडा गया
नफरत की एक नजर ही काफी थी उसके लिए

3 comments:

डॉ. मोनिका शर्मा said...

वाह , संवेदनाओं से भरी रचनाएँ।

AWADHESH KUMAR DUBEY said...

सार्थक रचना !
गोस्वामी तुलसीदास

GathaEditor Onlinegatha said...

Thanks for sharing such a wonderful line
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