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Monday, January 11, 2016

1
तुम गुलाब बन खिलना
मै कांटा बन
करूँगा रक्षा तुम्हारी
तुम्हे टूटने से बचा न सक तो
तोड़ने वाले के हाथ जख्मी तो कर दूंगा
2
गुलाब के ऊपर
गिरी शबनम
जानती है
सूख जाएगी धूप  में
पर फिर भी चली आती है
उसके मोह में

भगवान
मुझे गुलाब मत बनाना
मुझे   बनाना
रूप गंध विहीन
 छोटा सा फूल
क्यों की मुरझाने से पहले
 नहीं होना चाहता जुदा
मै अपनी डाली से

सुनो
अगले जन्म में
तुम गुलाब न बनना
कोई न कोई तोड़ ही लेगा
तुम कांटा भी न बनना
सभी बुरा कहेंगे तुम्हें
तुम गर्मी बन धरती पर उतारना
मै अनाज बन उगुंगा
छू कर तुम्हे
सुनहरा हो जाऊँगा
और बन जाऊँगा वरदान
किसी भूखे के लिए

Tuesday, January 5, 2016

नींद पढ़ती रही गीता
बैठ के सिरहाने
पर   पलकें
बंद होने से
करती रहीं इन्कार
शायद
 बाकी था इन्हें
अभी कुछ और दर्द देखना

Thursday, May 21, 2015

 तुमने कहा था
----------------


तुमने कहा था
अपने गगन से मुझे विस्तार दोगे
अपने झरोखे से गिराओगे
छाँव के बादल l
सूरज का एक दीप
मेरी चौखट पर सजाओगे
मै देखती हूँ
तुम्हारा गगन ,झरोखा और सूरज
उम्मीद करती हूँ
और निराश होती हूँ
कोई इस तरह भूलता है
कहीं अपने वादों को

Thursday, February 5, 2015

दर्द की एक नदी
मुझसे  हो कर गुजरती है
कतरा कतरा मरता मेरा वजूद
उसमे घुलता जाता है
नदी की मछलिया
बहुत उदास है
आज भी अक्सर
सुनाई देती है उनके रोने की आवाजे
-०-
सूरज उतरता है नदी में
लहरो से करता है बातें
कुछ दुःख की कुछ सुख की
शर्म से लाल होती हैं लहरें
किनारों को पसंद नहीं सूरज का आना
वो  सिमटने लगता है
सुना है अब वहाँ नदी नहीं
बस एक धारा बहती है
-०-
मोहब्बत की
 पुरानी पड़ती परिभाषाएं
दीमक लगते बिम्ब
पीली पड़ती उपमाओं से अलग
कुछ लिखना चाहा
तो शब्दों ने बगावत करदी
बोले
नए रूप में
मै खुद ही नहीं पहचान  पाऊँगा
वैसे भी
मेरी जड़ों मेँ दीमक लगने लगा है
-०-
प्रेम  के चौखट पर
खिला रहता था एक लाला गुलाब
न जाने क्यों
वो धीरे धीरे काला होने लगा
हरी पत्तियां
भूरी हो गयीं
कहते हैं उसकी ज़ड मेँ
शक के कीड़े को घुसते देखा गया
-०-
चौराहे पर पड़ा
प्रेम बीज
खिलने की हसरत लिए
करता रहा स्नेह की नमी का इंतजार
और दम तोडा गया
नफरत की एक नजर ही काफी थी उसके लिए

Thursday, January 22, 2015


प्रेम  नदी
 
उमंग के आसमान से
बादलों की ऊँगली थामे
पहाड़ों के सिरहाने
आकर चुपके से बैठ जाती है
प्रेम  नदीl
अपने अस्तित्व को समेटे
पर्वत की शिराओं में
बहना चाहती है
पर खिसकते हैं पत्थर
और धकेल दी जाती है
वो प्रेम नदी l
उसकी लहरों में
बहुत गहरे तक धंसे होते हैं
पत्थरों के नाखूनों
वो गुलाबी नदी
सफ़ेद पड़ने लगती है
और धीरे धीरे सूख जाती है
लोग कहते हैं
आज भी कभी कभी
पहाड़ों के सिरहाने आकर बैठती है
प्रेम  नदी
इस उम्मीद से के शायद
इस बार वो बह सकेगी पर्वत की शिराओं में


ताज की खूबसूरती देखने वालों
ध्यान से सुनो
इसको गढ़ने वालों की
सिसकियाँ
 सुनाई देती हैं आज भी
-०-
ये ईनाम था या सजा
हाथ काटने के बाद
बहुत देर तक
सोचता रहा वो मजदूर
-०-
दुनिया को
नायब तोहफा
कवियों को  विषय
प्रेमियों को
कसमे खाने का ठिकाना
देने वाला वो मजदूर
 खुद
अपने आंसू भी नहीं पोछ सका था
-०-
सफ़ेद संगमरमर पर
उभरते
ये काले धब्बे
कुछ मजबूर इंसानी की
आँहें हैं

-0-
यमुना में प्रतिबिम्ब मेरा
क्यों धुंधला है ?
मेरी आँखों में  आँसू है
या पानी मैला है
खुली आँखें
उज्वल सपने
लेकर आये थे  यहाँ
वख्त की गर्द
भर गयी आँखों में
अब मुंदी मुंदी सी रहती हैं वो
और धुंधले हुए सपने
 आईने में अपनी पहचान ढूंढते हैं
-०-

इन हवाओं के संग
भेजे हैं माँ ने
कुछ पूजा के फूल
के होने लगे हैं अब
अंकुरित सपने
मेरी इन बंजर आँखों में

Monday, November 24, 2014



हम तीनों की आँखें
टंगी है ,
तुम्हारे जिस्म की खूंटी पर l
हमारी सांसें ,बहती है
तुम्हारी हथेलिओं में
रेखाएं बन कर
और हमारा भविष्य
तुम्हारे मस्तक की श्रम बूंदों में झिलमिलाता है 
तुम्हारे चारो ओर
घूमती हमारी उम्मीदें
प्रेम के उस सोते में दुबकी लगाती हैं
जो तुम से हम तक
हमेशा बहता रहता है
तुम इस परिवार की
रीढ़ की हड्डी हो
तुमको झुकने और टूटने का हक़ नहीं

Thursday, May 22, 2014

जब वो उदास होती है
तितलियों से मांग के रंग
बनाती  है इन्द्रधनुष
खामोश शब्दों मे
भरती है गुनगुनाहट
लेट कर घास पर
ढूंढती है चेहरे  बादलों मे
खेलती है पानी से
 बटोरती है सीपें
बना के अपने चारों ओर क्यारियाँ
खुशियाँ बीजती है
दौड़ती है नंगे पाँव
ओस के खेतों मे
खुद को दुलारती ,है
 मनाती है खुद ही को
जब वो उदास होती है
अपने बहुत पास होती है

Wednesday, May 14, 2014

माँ
रिश्तों के गुलदान में
रोज ही सजती
संवेदनाओं के नए पुष्प
डालती स्नेह का छीटा
ताकि बानी रहे ताजगी
पुराने रिश्तों में 

-0-
वो रोज
घर पर फ़ोन करता है
सभी हाल चाल  पूछते हैं
पर
'घर कब आओगे 'कोई नहीं पूछता  

-0-

Tuesday, February 11, 2014




लहू लुहान
घायल
भावनाएं तुम्हारी
सिसकती रही
लाख  पूछने पर
तुमने कहा
नागफनी से उलझ गईं थी
पर ये नहीं कहा की
वो नागफनी का जंगल
मेरी  ही जीभ पर उगा है
-०-
पथरीली राह पर
बे  खौफ चलती  मै
अपने पैरों पर
अभिमान करती रही
पर आज
अचानक जो मुड़ के देखा
रिस रहा था लहू
  तुम्हारी घायल हथेलियों से
-०-
प्रेम का शब्द
उछाला जो अम्बर की ओर
बादल का एक टुकड़ा
घरती पर आ गिरा
सुबह
धरती भीगी सी थी
-0-

 मै तुम्हारा हूँ
पर खोने से डरती हो शायद
इसी लिए
टूटी पलक को
हाथ  पे रख
आँख बंद कर बुदबुदाती हो प्रार्थना
और फूख मारदेती हो
-०-
तुम्हारा प्यार
जैसे बंद कमरे की
खोल दी हो खिड़कियाँ किसीने
धूप  का एक टुकड़ा
हाथों में कुछ अधखिले पुष्प ले कर
नंगे पांव अंदर आया
और  सीलन भरे
हर कमरे को  महका गया
-०-
तुम्हारा प्यार
भजन की वो तिलस्मी पंक्तियाँ
जो जादू की  छड़ी से
उदास तितली को छूता  है
और वो
तुम्हारे रंग की खुश्बू से
महकने लगती  है

Thursday, January 23, 2014

 दोस्तों नए साल में कहा बहुत कुछ पर पोस्ट कुछ भी नहीं किया। आज आई हूँ नए साल की बहुत सारी सुभकामनाओं के साथ.
इस  शहर से बहुत अनुरोध किया की मुझे भी अपनी पहचान ले पर उसने मुझे अजनबी ही रखा

बहुत चाहा की
पहचान ले ये शहर
मेरे कदमो की आहट को
अपने  हवाओं के परदे में
मुझे भी पनाह दे दे
मेरी उम्मीद में
अपने फूलों के रंग भर के
इंद्रधनुषी कर दे 
अपनी सड़कों के कानों में
फुसफुसा दे मेरा नाम
ताकी मै  उनके लिए अपरचित्त न रहूँ
इतने सालों बाद भी
ये हो न सका
अभी भी
मै और शहर साथ हैं
पर अजनबी की तरह
-0-
इस शहर की चादर से
जानी  पहचानी सी खुशबु आ रही थी
 देखा तो पाया
के मेरे सपने
इसकी सिलवटो में
पैर पसारे बैठे हैं
इस उम्मीद में
के मै आऊँ
और उन्हें
इस शहर की  फ़िज़ाओं में बो दूँ l

Wednesday, November 27, 2013

'एड्स 'ये मेरा विषय नहीं है पर फिर भी लिखा .पता नहीं अपनी बात कहने में सफल हुई की  नहीं .अब आप ही बताइये तो पता चले


 तुमने कहा
----------------------


तुमने कहा
सूरज की  किरण
ओढ़ने के बाद भी
तुमको गर्मी न मिली
चांदनी की
मखमली छाँह
तुम्हे शीतलता न दे सकीं
तुमने कहा
मेरा एक विचार भी
तुम्हे ऊर्जा देता है
तुम्हारी छत पे
उतरता है चाँद
और तुम्हारा घर
मेरी खुशबु से भर जाता है
तुमने कहा
बर्षों बाद लौट रहा हूँ
उस हवा की तरह
जो तुम्हारे बालों को छेड़ती है
उस धूप की  तरह
जो तुम्हारे बदन को छू कर
और भी चमकीली हो जाती है
तुम आये
तुमने कहा
तुम्हारा प्यार अकेला है
उसे मुझमे पनाह चाहिए
और मैने
उसे अपना सब कुछ दे दिया
तुमने कहा
बहुत कुछ
पर ये नहीं कहा
के  तुम्हारे प्यार में ज़हर है ,
तुम्हारी बेवफाई
कीटाणु बन कर दौड़ रही है लहू में l
देखो अब
तुम्हारे प्यार को
पनाह देने की चाह  में
मर रही हूँ मै 

Friday, November 8, 2013

 बचपन जीवन की सबसे मासूम और चिंता मुक्त अवस्था है .परन्तु जब हम बच्चे होते हैं तो हमको बड़े होने की जल्दी होती है .और जब बड़े होजाते हैं तो लगता है की बच्चे ही भले थे l बचपन की याद हमारे मन के एक कोने में सदा ही जीवित रहती है और समय समय पर शब्दों में ढल कर कागज पर उतर आती है कभी कविता ,कहानी चित्र या फिर कुछ और बन कर l आज की  कविता भाई किशोर जी के दिए विषय पर लिखी है समाज कल्याण  पत्रिका के लिए .मेरी कविता को पत्रिका में स्थान देने के लिए भाई किशोर श्रीवास्तव जी का धन्यवाद और आभार





मेरा बचपन बैठा है
--------------------------------

वहाँ के मौसम
आज भी कहते हैं
मेरे बचपन की कहानियां
धूल  भरी उस पगडण्डी पे
साईकिल के टायर को
डंडी से मारते  हुए
दूर बहुत दूर
बेफिक्री में दौड़ते
वो मासूम पाँव
जिन्हें मंहगे
जूतों की  जरुरत कभी नहीं पड़ी
जब खेतों में
गन्ने मुस्काते थे
और मटर दानों से भर जाती थी
तब दिन का खाना
खेतों में ही हुआ करता था
उस समय
पिज़्ज़ा बर्गर दिमाग में नाचते नहीं थे
खून का नहीं था
पर हर घर में एक रिश्ता था
कहीं बाबा ,ताऊ ,चाचा
तो कहीं भाभी ,ताई ,चाची
इन रिश्तों के आंगन में
मै कभी गेंद खेलता
कभी स्नेह से दादी के हाथों दूध पीता
ये वो नाते थे जिन्हें
दिखावे की कभी जरुरत नही हुई
गाँव की हवाओं ने
मेरी तोतली बोली को
अपने ताखों में संजो के रखा है
पेड़ ने अपनी शाखों पर
मेरी  तस्वीरें  लगा रखी है
 तब कैमरे कहाँ होते थे
बचपन की गलियों से
मेरे बड़े होते  सपने
मुझे खीच  के यहाँ ले आये
पर उस गाँव की मुंडेर पर
 पैर लटकाए
अभी भी
मेरा बचपन बैठा है 

Friday, October 4, 2013

मैने तो खेतों में
फैक्ट्री नहीं बीजी थी
न जाने कैसे
चहुँ और मशीने उग आईं 
-0-

न जाने क्यों
मन हंस ने
खुशियों के मोती चुनने से
इंकार कर दिया
 शायद
गम उसे अब रास आने लगा है
-0-
हर रोज
उगाती  हूँ
एक उम्मीद अपनी हथेली पर
सूरज से
मांग  कर
एक कतरा धूप
उसको पोस्ती  हूँ
पलकों से
उसका पोर पोर सहलाती हूँ
मगर 
न जाने क्यों
शाम ढलते ढलते
वो मुरझाने लगती  है
रात  फिर डराने लगती है मुझे
और मै
 उम्मीद की लाश आपने आगोश में लिए
पलंग के एक कोने में सिमट जाती हूँ

Thursday, July 18, 2013

जो हुआ क्यों हुआ ?किसने किया ?किसके कारण हुआ ?इन सब बातो  का उन घरों के लिए अब क्या मतलब है जिनकी  मासूम आवाजें हमेशा के लिए शांत हो गईं l कुछ समय तक अख़बार की सुर्खियाँ बने रहने के बाद ये मामला भी अन्य मामलों की तरह गुम हो जायेगा l जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है वो जीवन भर इस दर्द के साथ रहेंगे .....................................

बुधिया सोचती है


बुधिया सोचती है
काश के वो चार आने
उसने मुनिया को दे दिए होते
जो उसने
कम्पट खरीदने को मांगे थे
सी दी होती उसकी फटी फ्रोक
जो आज
स्कूल से आने के बाद
सीने वाली थी
काश के उसकी कोंपी पर
चढ़ा दी होती जिल्द
थकान के कारण
रोज कल पर टालती रही थी वो
उस दिन मेले में
दिला दिया होता
उसको बर्फ का गोला
कितना रोई थी
मुनिया उसके लिए
बुधिया सोचती है
ये सारे काम
अब वो कभी न कर पायेगी
बुधिया सोचती है
कल मुनिया और उसके दोस्तों को
शोर मचाने पर
नाहक ही उसने डाटा था
अब इस बस्ती में
कभी न गूंजेंगी
इनकी आवाजें l
दर्द के इस सन्नाटे में
हर घर  चीख रहा है
बुधिया सोचती है
काश के मुनिया आज भूखी रह गई होती
और इन चीखों में शामिल हो जाता  है
उसका करुण क्रन्दन भी




Saturday, May 11, 2013

माँ एक शब्द नहीं ग्रन्थ है जिसमे पूरा संसार समाया है l माँ वो हाथ है ,जिनको आज भी थामने पर एक शक्ति का अहसास होता है l माँ वो सानिध्य है, जो पास न होते हुए भी पास होने  का अनुभव  है l माँ वो अभिलाषा है जो सोचने से पहले ही पूरी हो जाती है l माँ वो प्रार्थना है ,जो कभी खाली नहीं जाती l माँ वो लोरी है ,जिसे सुनकर बुरे समय में भी नींद आजाती है l माँ वो जीती जागती  मूर्ति है, जिसको पूजने का दिल करता है l माँ वो दुनिया है, जहाँ बच्चा स्वयं को पूर्ण महसूस करता है l





  'नहीं जी ऐसा नहीं है '
आज माँ ने कहा था
जीवन भर
पिता के सामने 'हूँ ','हाँ '
करते ही सुना था
शायद
अब उसे
बड़े हुए बच्चों का
सहारा मिल गया था
-0-
 उनके कुछ कहते ही
एक भारी  रोबीली आवाज
और कुछ कटीले शब्द
यहाँ वहां उछलने लगे
रात मैने  देखा
माँ
अपनी ख्वाहिशों पर
हल्दी प्याज का लेप लगा रही थी
-0-
 आज
उस पुराने बक्से में
मिली माँ की
कुछ धुंधली साड़ियाँ
जिनका एक कोना
कुछ चटकीला था
जानी  पहचानी
गंध से भरा हुआ l
काम करते करते
अक्सर यहीं
हाथ पोछा करती थी माँ l
-0-
कल रात
 कुछ खट्टे सपने
पलकों में उलझे थे
झड रही थी उनसे
भुने मसलों की खुशबू
माँ ने शायद फिर
आम का आचार
डाला होगा
-०-
मेरे माथे पर
हल्दी कुमकुम का टीका  है
कल मेरे सपने में
शायद फिर से आई थी माँ
-०-

   

Monday, March 25, 2013

 ये चंचल रंग आपका हर पल रंगते जाएँ एक ऐसा इन्द्रधनुष आपके आँगन उतरे जो कभी ख़त्म न हो
होली की बहुत बहुत शुभकामनायें


फूल  खिले .वृक्ष सजे ,
चले मधुर बयार
मौसम ले आया  फागुन का उपहार

अबीर पहन पायल
छम छम डोले
गुलाल हौले से घूंघट  खोले
छा रहा कलियों में  प्यार का खुमार

गुझिया ठुमके ,
पापड़ छत पर सूखे
फिर भी गलियों में घर कई  भूखे
पेड़ की फुनगी पर उतरी है बहार

बादल  ने
लगाया धरती  को रंग
गुलाबी फिजा में घुली मानो  भंग
लजाई सरसों सूरज करे मनुहार


मदमस्त रंग उड़े
अपनी चाल  भूले
खुशबू पकने लगी  जल गये  चूल्हे
फगवा के आगे कौन गाये  मल्हार

Friday, March 15, 2013


छत की मुंडेर
 पर बैठी मै
पैर  हिलाती हुई
अपने दर्द को
सहलाती पुचकारती
उससे पूछती हूँ
क्यों रे
मुझसे तेरा दिल न भरा
कभी तो मेरा साथ छोड़ा होता
वो खामोश सुनता रहा
मै नीचे उतर आई
आँगन से देखा
वो अभी भी मुंडेर
पर बैठा था .
उसने भरी आँखों से मुझे देखा
और छलांग लगा दी
मै चीख पड़ी
गली में
उसका वजूद
बिखरा पड़ा था
और मै
एकदम खाली  हो गई थी
क्योंकी मेरे अन्दर
उसके आलावा कुछ न था ......

Thursday, January 17, 2013

आज बिना कुछ लिखे ये कविता पोस्ट करना चाहती हूँ क्योंकी लिखने को इतना कुछ की न लिखना ही अधिक ठीक है


 पेड़ ने शोक न मनाया
जबएक एक कर
 पत्ते  साथ छोड़ गए
दुखी न हुआ तब भी
जब गिलहरियों ने चिड़ियों ने
उस पर फुदकना छोड़ दिया
कुछ न कहा उसने
जब सूरज की किरण
जो थामे रहती थी
हर वख्त
उसका दामन
छोड़ उसे
 धुन्ध  की गोद में समा  गई
चुप रहा  वो
 जब ठूठ हुए  बदन को
बर्फ के फूलों की चादर
ने ढक लिया
ठंढ की लहर
उसको अन्दर तक छिल गई थी
पर आज
तो वृक्ष चिटक गया था
दर्द का एक दरिया
फुनगी से जड़ों तक बह रहा था
और उसकी उदासी से पूरा मौसम उदास था
 आज उसने शायद न्यूज़ देखी ली  थी
संस्कारों के देश में
दरिंदो का तांडव देखा था
और महसूस किया था उस चीख को
जिसको वो अमानुष
न महसूस कर पाए
उदास  था वो  दरख़्त
क्योंकी  न्याय की प्रतीक्षा में
दो जोड़ी आँखें
आज भी झाँख रहीं हैं  अम्बर से  

 

Thursday, January 3, 2013


 आप सभी को नये साल की बहुत बहुत शुभकामनायें .भगवान सभी की मनोकामनाएं पूरी करें
 
 
नव वर्ष
तुम आओ
अब सहा नहीं जाता
अब बीतना ही होगा मुझे
देखते हो न
घायल मेरा तन
मेरे अपनों ने ही दी है
ये निशानियाँ मुझे
ये घाव
लड़कियों की चीख के हैं
जिनकी मासूम हथेली पर
हैवानियत के अंगारे रख दिए गए
ये फफोला
उस आग का है
जिसमे ऋषियों की ये धरती जल रही है
ये काला निशान
माँ भारती के चेहरे की
वो कालिख है
जो उसके ही सपूतों ने
लगाई है उसके चेहरे पर
आंसुओं का जो दरिया
मेरे पास से बह रहा है
ये उन बूढ़े माँ -बाप का दर्द है
जिनके सपूत आने का कह कर
कभी वापस न आये
मित्र
मै दर्द के धुंएँ
और काँटों भरी राहों से
उम्मीद के कुछ बीज बचा पाया हूँ
तुम्हे सौपता हूँ
इसे जरुर बो देना
शायद उग सके मानवता का एक वृक्ष
और लग सके उसपर
शांति ,मुस्कान ,न्याय और प्रेम का फल
नव वर्ष
तुम आओ
पर साथ लाना
जुगनुओं भरा आँगन
निडर एक राह
और नारी होने का सम्मान
जो मै न ला सका
ताकि नव वर्ष हर्ष वर्ष हो सके 
 इतना कह
वो चुपके से बीत  गया  

Tuesday, November 13, 2012

सभी को दिवाली की बहुत बहुत शुभकामनायें .लिखना तो कुछ और चाहती थी पर न जाने कैसे ये लिख गया .यही कुछ फूल बटोर पाई हूँ इनमे कितनी खुशबू  है ये तो आप ही बतायेंगे


मुझे डराने को
 सुतली बम जलाते  थे तुम 
मै  डर कर
छुप जाती थी
आज भी
हर दिवाली डरती हूँ
पर सुतली बम कोई नहीं जलाता

-0-

सुनो ,
 दिए बुझने लगे है
थोडा तेल तो डालो l
उस बरस कहा था तुमने
मुझे आज भी
सुनाई  देते हैं वो शब्द
और मै  तेल ले कर
छत पर आजाती हूँ

-0-

बरसों बाद
लौटे जो तुम घर
एक ख़ुशी की किरण
आँगन उतरी
और घर
महकने  लगा

-0-

दिया लिए हाथों में
तुम चली
 चौखट की ओर
चाँद सोचता रहा
दिए में चमक ज्यादा है
या चेहरे का नूर

-0-

काले कपडे पहन
चाँद ऊँघ  रहा था
के एक शोर से चोंक गया
खिड़की से झाँका
 तारे चिल्ला रहे थे
"घरती के तारों की चमक
हमसे ज्यादा कैसे "?

-0-

चमकते घरों के बीच
मुरझाई झोपडी से
आवाज आई
माँ ये दिवाली  आती ही क्यों है ?
आज
अपने घर का अँधियारा
और गहरा लगने लगता है

-0-

लाखों तारों से
 सजी थी  धरती
इसकी सुन्दरता देख
 जल  उठा  अम्बर
और काली  चादर ओढ
सो गया

-0-

वो एक घर
अंधकार में डूबा  था
सुना है
इस घर का मालिक
तारा  बन गया है
-0-

Monday, October 15, 2012

 सरस्वती सुमन पत्रिका के क्षणिका विशेषांक में मेरी भी क्षणिकायें है  हरकीरत हीर जी का आभार और इतना सुन्दर अंक निकालने के लिए बधाई .



लड़कियां
देवी ,सुशील ,कुलीन ,
इन भरी पदवियों के नीचे
घुटती हैं
अपने   ही
 खुशियों की लाश लिए
चिरनिद्रा में सो जाती हैं

=============================
लड़कियां
सपनो को
आंटे में गूंध
कढ़ाही में तल देती हैं 
और बाहर
सपनों की लाश पर
सज रही होती है
खाने की मेज
=================
लड़कियां
स्वेटर की मानिन्द
पहना
गर्माहट लिया
अगले जड़े उधेड़ दिया
=====================
लड़कियां
माँ ,बहन ,पत्नी 
समझी जाती है
पर
इन्सान नहीं
=====================
लड़कियां
नई किताब की मानिन्द
पढ़ा सहलाया
अलमारी में ठूंस दिया
न झाडा ,न पोंछा
न धुप दिखाया
अस्तित्व की चीख
धीरे धीरे ,
दीमक चाटता गया
=================
लड़कियां
मौसम है
बदलती है रूप
औरों के लिए
सुगंधों में खिल के
सुख के बादल बिखराती हैं
और
पत्तियों सी झड जाती हैं
======================
लड़कियां
वो कोख हैं
जो कोसी जाती
श्रापी जाती
फिर गिरा दी जाती  हैं
=========================
लड़कियां
देह से मापी जाती हैं
गोरी ,पतली ,लम्बी
शिक्षा ,रूह की रज़ा
कोई नहीं पूछता
===========================
लड़कियां
क्यों ?
कहाँ ?
कब?
 के तीरों से घायल .
और सवालों का लक्ष्य होती हैं
पर जवाब
 सुनता कोई नहीं
===========================
लड़कियां
जब बैठती है एकांत में
खुद से रूबरू होने को
नागफनी सी उगती है
चारो ओर अभिलाषाएं
पूछती हैं
एक ही सवाल
मेरी हत्या क्यों की ?
==========================

ये दो  क्षणिकायें  इस  में नहीं है पर सोचा की शायद आपको पढ़ कर अच्छी लगे
लड़कियां
किसी की नहीं होतीं
माँ पिता के लिए
पराया धन
और उनके लिए
पराये घर से आई (बहू)
======================
लड़कियां
जिनका
कोई नहीं होता
खुद लड़कियां भी नहीं
===========================

Thursday, October 4, 2012

रचना बहन ने पूछा "सब ठीक है न "? कुछ ठीक है कुछ नहीं है .............बहन बहुत अच्छा लगा की अपने पूछा .कभी कभी किसी दुसरे का दुःख भी अपना ही लगने लगता है कुछ ऐसा ही हुआ मेरे साथ बस उसी दर्द में मेरे कुछ शब्द बह चले और ये कविता बनी 


एक बेल 
=============


एक बेल
जो सहारे की तलाश में निकली
तुमसे  लिपटी
और तुम्हारी होके रह गई
तुम्हारी पीठ पर
 उतारे उसने
बहारों के कई रंग 
हथेलियों  में खिलाये गुलाब
उसने 
उतनी ही धूप ली
जितनी  तुमने दी l
हवा की टहनी पर
उतना ही झूली 
जितना तुमने चाहा
धरा के उस छोटे टुकड़े को
घर कहती रही
जिस पर तुमने  इशारा किया
एक रोज अचानक
 गिरने लगी
कट कट के वो
पीले पड़े
अपने पत्तों को समेटती
मुरझाये फूलों की
पंखुडियां उठती
अपनी  ही लाश पर
बहुत देर रोती
घूल में समां गई 
उस रोज  तुमने उससे कहा था
"और कितनो के लिए
बहीं है ऐसे ही
भावनाए  तुम्हारी "

Thursday, August 30, 2012

कभी कभी कोई दर्द इतना गहरे बैठ जाता है की उसकी जलन शायद जीवन भर महसूस होती रहती है . ..किसी अपने से दूर होने के कारण आँखें उसको देख नहीं पाती पर महसूस कर पाती है वही भावना शब्दों का सहारा ले कर आज यहाँ उतर आई है .


क्यों होजाता है अकेला ?

जीवन भर
समय की ट्रेन
पकड़ने को
भागते रहे कदम
भोर से धुंधलके  के बीच
काम और अपमान  की
 दोधारी तलवार पर
चलते रहे l
लू  की  जलन
ठण्ड की पपड़ियाँ
छिलती  गईं देह
पर तुम्हे
ये ज़ख्म देखने की
फुर्सत कहाँ थी
तुम तो पूरी करते रहे
 उम्मीदों की भी उम्मीद
अपने ही चरागों  की
भटकती लौ को
 सहारा देते तुम्हारे हाथ
अपमान के फफोलो से भर गए
फिर भी
घर को
बचाने के लिए 
तुम नीव का
वो  पत्थर बने
जिसकी सराहना किसी ने नहीं  की
चक्की
में  पिसता रहा
तुम्हारा श्रम
पर भूख
किसी की शांत न हुई
सब कुछ दे कर भी
एक पुरुष
क्यों होजाता है अकेला
अपने अंतिम  पलों में ?

Saturday, June 9, 2012

भारत गई थी अतः बहुत दिनों से आप सभी से दूर रही आज माँ गंगा पर लिखी कुछ क्षणिकाएं आप सभी के सामने प्रस्तुत हैं .गंगा एक नदी ही  नहीं ,एक माँ है ,एक विश्वाश है ,एक आस्था है l

क्षणिकाएं
================================
ना गंगोत्री
ना गोमुख
अब मेरा पता
वृद्धआश्रम
-0-
अब दिखते  नहीं
बस्तियों के प्रतिबिम्ब मुझमे
जल का दर्पण
मैला जो हुआ
-०-
जलने लगी हैं
अब आँखें मेरी
शायद
चुभी है इनमे
तुम्हारे पापों  की किरचें
-०-
अपनी लहरों के जख्म
सीते हुए
साँझ हुई
पर ज़ख्म है की
भरता ही नहीं
-०-
उठ रहा है
मेरे तट से  धुवाँ
आज फिर
किसी घर में
मातम हुआ होगा

Tuesday, March 20, 2012

 उम्र ओस की बूंद सी भाप बन  उड़ जाती है ,बालों में चांदनी  सी खिलती है और घुटने के दर्द में अपना वजूद छोड़ जाती है .इसी समय सही मायने में जीवन साथी की सबसे अधिक जरूरत होती है और  उसके साथ  छूटने का डर भी सबसे ज्यादा होता है



उम्र की साँझ में
=====================


 
सुनो
तुम्हारे पिंजर हुए हाथों की
चटकती नसों मे
मेरी भावनाएं
आज भी दौडती हैं
तुम्हारे चेहरे की झुर्रियां
मेरे अनुभवों का ठिकाना है
आँखों के
इन स्याह घेरे मे
मेरी गलतिओं ने पनाह ली है
आंटे में
न जाने कितने बार
गूंधी  हैं
तुमने बेबसियाँ
पर चूड़ियों की खनक में
आने न दी उदासी
उम्र की साँझ में
एक तुम ही उजाला हो
सुनो ,
मुझे
मुझसे पहले छोड़ के न जाना

Friday, February 3, 2012

मेरी माँ हमेशा कहती है कि इस एक चुटकी सिंदूर में न जाने क्या होता है की स्त्री जीवन भर के लिए उसी की हो के रह जाती है .सारे रिश्ते पीछे छूट जाते हैं . उसकी  ख़ुशी में खुश और  उसके दुःख में दुखी होती रहती है और ऐसा करने में ही स्त्री को सवार्गिक सुख मिलता है .इसी भाव से प्रभावित है ये कविता ......................

समर्पण
==============
सामाजिक रीत निभाने को
मेरी मांग में ,
लाली भरी
पर रिश्ते को पागा नहीं
प्रेम की चाशनी मेंl
तुम्हारी नजरो की चाह में
चन्द्र किरण से सजी
पर देखा इस तरह
जैसे बेवख्त आये मेहमान को
देखता है कोई
स्नेह की  रोली बन
बिकी मै हाट में
तुमने ख़रीदा ,
और बिखेर दिया
तुम्हारी बेल में फूल बन खिली
गैर के लिए तोडा मुझे
शी लव मी शी लव मी नोंट
कहते हुए
मेरी पंखुड़ी पंखुड़ी नोच डाली
कभी जोड़ा जो नेह
तो इस तरह
के दो वख्त की रोटी के बदले
ले लेता है आबरू
मालिक जैसे
संबंधों के दरख्त को
मै लहू से सीचती रही
खुद को समेट
सौपती रही तुम्हें
और तुम,
मुझे तार तार उधेड़ते रहे
 फिर भी,
हर धागा बस यही कहता रहा
मेरे मांग की लाली,
कलाई की खनक
मंगल सूत्र की चमक हो तुम 

Monday, December 19, 2011

सूरज ने मई जून में मिले लोगों के तानो से परेशान होकर जो अपने किवाड़ बंद कर लिए .घुन्ध आकाश के आँगन से निकल घरती पर पसर गई .ठंढ हाथ रगडती हुई स्वेटर पहन इतराती घूमने  लगी ऐसे में कहीं कोई स्वयं को जीवित रखने के लिए कर रहा था प्रार्थना कुछ टुकड़े कम्बल के लिए .पर सुनी जाती है दुआ कब गरीबों की ................................


मौसम ने ओढ़ी
शीत  की चूनर
पारा  नीचे गिरता गया
छोटू ने पानी डाल
कोयले की आग बुझाई
तो शहर 
लिपट गया कोहरे में
ठंढ खुद इतनी ठंढी हुई
के बैठ गई उकडू
जलते अलाव के पास
सूरज ने  बढाया घर का तापमान
चाँद ने रजाई ओढ़ी ली
माँ ने थामी ऊन सिलाई
ठन्डे हाथों से
 वो बुन रही  थी फंदों में गर्माहट
कपड़ों की गठरी बने लोग
चल रहे थे
कम कर के शरीर का क्षेत्रफल
धुंध की महक वाली  हवा
फिर भी न जाने कैसे
कुरेद रही थी हड्डियों को
दूर बस्ती में
फटे कम्बल से
खुद को ढक रहे थे वो चारों
सुबह अख़बार में
छोटा सा लिखा था
शीत लहर से चार की मौत 

Thursday, December 1, 2011

तेरे आने से


जन्मदिन खास क्यों होता है ?शायद इसलिए कि बीते वर्षों का एक एक पल जीवित हो  सामने खड़ा होकर मुस्कुराने लगता है ,और बरबस ही सारी घटनाये आँखों में चित्र सी तैरने लगती हैं आज ऐसा ही कुछ हुआ जब बेटे को स्कूल जाने के लिए तैयार कर रही थी .तो उसके जन्म से ले कर आज तक की सारी  बातें भावनाओं में गुथ कर महकने लगी .,मन प्रार्थना करने लगा भगवान मेरे बेटे को लम्बी उम्र देना ,और अपनी कृपा सदा ही इसपर बनाये रखना .खुशियों का वो फूल खिलाना जिस पर पतझर का मौसम कभी न आये .


तेरे आने से
----------------


उस रात
सूरज उगा था
मेरे आँचल में
तब  उजाले से भर गईं थीं मेरी आँखें
और मेरा कमरा
गुनगुनी खुशबु से महकने लगा था
पीड़ा की गठरी में से निकल
सुकून की तितलियाँ
उड़ने लगीं थीं मेरे चारो ओर
मेरी सोच और यथार्थ में ,
 परिवर्तन न था
तुमको देखा तो लगा
जानती हूँ हमेशा से
ईश्वर की इस दुआ से
गोद सजाई तो
उसके गुदगुदे पाँव
मेरी हथेलियों को पवित्र कर गए
जीवन का सन्देश देतीं
उसकी अधमुंदी आँखों की चमक
मेरे जीवन की मुंडेर पर
जुगनुओं सी सज गईं
आज स्कूल जाते
उन पाँच वर्षीय  नन्हे पैरों को
हौले से सहलाया  
उसको हुई थोड़ी गुदगुदी
और मेरी हथेलियाँ पुनः पवित्र हो गईं   

Friday, October 14, 2011

स्त्री अपने सिन्दूर के लिए टुकड़े टुकड़े बिखरे बादल को बटोर कर साया कर देती है सूरज अपनी गति कभी भी बदले धूप को अपने आँचल में समेट अँधेरे पथ को उजाले से भर देती है .स्नेह की दरिया आँगन में बहाने को नाजाने कितने व्रत उपवास रखती है .वो पूजती है तुम्हारे  एक एक शब्द को ,तुम्हारे अनुसार ढल कर तुम जैसी बन जाती है और तुमको पता भी नही चलता .
करवा चौथ आने को है उसी स्त्री के स्नेह रस में सजी एक पुरानी कविता आप सभी के सामने रखी है


अपने प्रेम को लिखने के लिए
शब्द ढूंढे
पर छोटे लगे
अलंकर ,संजा ,रस सब बहते रहे
फिर भी कुछ अधूरा रहा
मैने कागज पर
रख दिए लब
और कविता पूरी होगई
=======================
भावनाएं
जो उभरती है सिर्फ तुम्हारे लिए
सूरज में झुलसती ,बर्फ में पिघलती
बरसात में बहती है
पर तुम्हारी बांहों के लंगर में समां
शांत  होजाती है
महकने के लिए
------------------------------------------------
प्रेम रस से सीचती हूँ
अपने रिश्तों की जड़ें
तुम्हारे समर्पण से
वो गहरी, मजबूत  हो जाती हैं
संबंधो के वट वृक्ष को थामने के लिए
===================================
घटाओं से चुरा ,
कुछ बूंदें
तुमने रख  दीं  मेरे आँचल में
मैने पल पल समेटा उन्हें
और अंतर घट तक तृप्त हो गई
=====================================
कागज को ले हाथों में
मै सोचती रही तुम्हें
खोला तो देखा
उसपर लिखा था
प्रेम
============================================
प्रेम दरिया में बहते हुए
हम आये इतनी दूर
पीड़ा के दंश से
हर पल बचाया मुझे
पर तुम्हारे पांवों में छाले थे
और ज़ख़्मी थे हाथ
=========================

Tuesday, August 30, 2011

ताज्ज़मुल चाचा ,रहीमा फूफी ,सकीना आपा नाजाने ऐसे कितने ही रिश्ते ईद पर यादों की गिरह खोल बाहर आते हैं  और मेरी हथेली पर ईदी रख कर कहीं गुम  हो जाते हैं .आने लगती हैं मुझे सेवईयों की खुशबू ,सुनाई  देती है चूड़ियों की खनक और शीर खोरमा की याद मेरी स्वाद कलिकाओं को भिगो जाती है .जब भी माँ को फोन करो बिना पूछे बता ही देती है सकीना आपा की शादी होगई ,रहीमा फूफी बीमार है और ताज्जमुल चाचा .......................................................................



ईद मेले में
मै हरी चूड़ियाँ बन के बिका
तुम आयीं
और लाला चूड़ियाँ खरीद कर चली गईं
तुमको तो
हरा रंग पसंद था न ?
------------------------------------------

मूंद कर  मेरी आँखे
पूछा था तुमने
बताओ कौन हूँ मै?
उन यादों के पल
आज भी
मेरी अलमारी में सजे हैं
तुम कभी आओ
तो दिखाऊंगा
--------------------------------------------------
अचानक
मेरे बुलाने पर
चौंक कर पलटी थी तुम
और तुम्हारे मेहँदी भरे हाथ
लग गए थे मेरी कमीज़ पर
अब हर ईद पर
मै उसको गले लगता हूँ
आज भी इनसे
गीली मेंहदी की खुशबू आती है
--------------------------------------------------------
बादल  के परदे हटा के
झाँका जो  चाँद ने
मुबरक मुबारक !!
के शोर से सिमट गया
सोचा ,
निकलता तो रोज ही हूँ
पर आज ..................
उसे क्या मालूम
के वो ईद का चाँद है
-------------------------------
तुमने ,
उस रोज
मेरे कानों में
हौले से कहा था
'ईद मुबारक '
अब ,
जब भी देखती हूँ ,
ईद का चाँद
खुद ही कह लेती हूँ
ईद मुबारक
-------------------------------

मैने
अब्बा के आगे
बढाया जो ईदी के लिए  हाथ
गर्म मोती की दो बूंदों गिरीं
और  हथेली भर गई
आज भी हर ईद पर
गीली हो जाती है हथेली
-------------------------------------

सेवईयाँ लाने
गया था बाजार वो
और ब्रेकिंग न्यूज बन गया
अब इस घर में
कभी सेवानियाँ नहीं बनती

Friday, July 29, 2011




वो स्वयं टूटती है, पर रिश्तों को जोड़े रहती है l.बिखरती है ,लेकिन पूरे घर को समेटे रहती है l स्थान ,समय ,और परिस्थितियाँ  उसका प्रारब्ध नहीं बदलते  l  अपने अन्दर की उर्जा को खर्च कर बहुत कुछ करती है ....जब तक कर पाती है ............


  एक औरत    



एक औरत
जब अपने अन्दर खंगालती   है
तो पाती है
टूटी फूटी
इच्छाओं की सड़क ,,
भावनाओं का
उजड़ा बगीचा ,
और
लम्हा लम्हा मरती उसकी
कोशिकाओं  की लाशें  
लेकिन
इन सब के बीच भी
एक गुडिया
बदरंग कपड़ों मे मुस्काती है
ये औरत
टूटती है ,बिखरती है
काँटों से अपने जख्म सीती है
पर इस गुडिया को
खोने नहीं देती 
शायद इसीलिए
तूफान  की गर्जना को
गुनगुनाहट में बदल देती है
औरत




यही कविता रचनाकार पर 
 
http://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_5925.html  

Tuesday, July 5, 2011

कहा उसने , डाली से टूट कर पत्ता सदैव भटकता रहता है .मासूम कदमो के नीचे यदि माँ की हथेली न हो तो वो पाँव जीवन भर जलते रहते हैं .ऐसे ही किसी की कुछ बातें सुनी तो ये शब्द कविता के जामा पहन मेरी हथेलियों में दुबक गए .

क्षणिकाएँ  
 

बच्ची  के मुट्ठी में
माँ का आँचल देख
अपनी हथेली सदैव
खाली लगी
--------------------------------

माँ पर कविता लिखूँ कैसे
मेरे पास है
एक  तस्वीर
जिसे माँ बताया गया
और कुछ फुसफुसाते  शब्द
"बिन माई कै बिटिया "
================================


ये दीवारे ,ये आँगन
जानते हैं मुझे
पर ये मेरे नहीं है
बहुत से लोग है यहाँ
लेकिन रिश्तेदार नही
ये बड़ी ईमारत
घर नहीं, पर घर है
इस  के ऊपर लिखा है
'अनाथाश्रम '
=========================

Wednesday, June 8, 2011

सच जब  बोलना  चाहता है ,तो हजारों हाथ उसके पंख नोच धरा पर पटक देते  हैं l जो सच इस दर्द को सह नहीं पाता वो दम तोड़ देता है या फिर खुद को बिकता हुआ देखता रहता हैl


सच  

मै सच को खोजने निकली
देखा ,नोटों के नीचे दबा था
कहीं झूठ की चाकरी कर रहा था
तो कहीं ,
 टूटी झोपडी के कोने में
घायल पड़ा था
पूछा- ये कैसे हुआ ?
कहने लगा -
मैने बोलने की कोशिश की थी ।

Sunday, May 22, 2011

माँ की चाहत पानी बन नदी में उतरती तो है पर भीगती नहीं .कभी कभी भीड़ में अकेली होती है और कभी अकेलेपन में भी एक भीड़ अपने आसपास जमा कर लेती है  माँ एक एसा  ब्रह्माण्ड  होती है जिसे बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं फिर भी कुछ नहीं जानते 



माँ की दी चीजों से बतियाती है माँ

रिश्तों की
सिलवटों को खोल
धूप दिखाती है
आँगन में सूखते हैं वो
भीगती है माँ
पेड़ की फुनगी से
उतार कर
घर में बोती है भोर
पर मन के
अँधेरे कोने में
स्वयं बंद होती है माँ
उजाले की
एक- एक किरण
सबके नाम करती है
और साँझ को
आँचल के कोने में
गठिया लेती है माँ
चौखट से अहाते तक
बिखरी होती है
सभी की इच्छाएँ
रात अकेले में
अभिलाषाओं की गठरी
चुपके से खोलती है माँ
रिमोट छीनने की जद्दोजहद
टी वी पर
समाचार का शोर
तेज संगीत की चकाचौंध
इन सबसे अलग
रसोई में
लोकगीत गुनगुनाती है माँ
गैरों के ताने
बरसते हैं
वो भीगती नहीं
अपनों की उपेक्षा
उसे बहा ले जाती हैं
सभी से छुपा के
पोंछती है आँसू
और उठके
काम करने लगती है माँ
होता है समय सभी के पास
पर उसके लिए नहीं
झुर्रियों में
अपना यौवन तलाशने को
खोलती है
दहेज़ का बक्सा
सहलाती है शादी का जोड़ा
माँ की दी चीजों से बतियाती है माँ

Friday, May 6, 2011

 विदेशी धरती का कुछ ऐसा आकर्षण होता है कि एक बार आने के बाद जाना मुश्किल होजाता है .कहते हैं ये पांच सितारा जेल है .फिर भी सभी यहाँ रहना चाहते हैं .पीछे गालियाँ चौबारे बुलाते हैं , याद में सूखते हैं ताल ,नदिया पर  ....


कहो तुम कब आओगे ?


कहो
तुम कब आओगे
अब तो
पानी में सूरज बुझ चुका
बूढ़ा बरगद
चौपाल से कट चुका है
पनघट के
प्यासे-चटके होंठों से टपकता लहू
धूल बन
गलियों-गलियों भटकता रहा
हवाओं में लगी
नफरत की गाँठ खोलने
क्या तुम आओगे
घर में
ईंटें कहतीं, दीवारें सुनती है
पगडण्डी पर ख़ामोशी
सन्नाटे को आगोश में भींचे
सहमी चलती है
चिड़ियाँ भी अब
फुसफुसा के बोलती हैं
क्या तुम आओगे
इस डर की चुप्पी को आवाज देने
या तुम आओगे
बहते हुये
चाँद के पानी में
या ढल के
ओबामा के शब्दों में
भारत-अमेरिका की बातचीत में
फॉरेन रिटर्न का तमगा लिए
सुख-चाशनी की चन्द बूँदे
फटे आँचल में टपकाते
या आओगे तब
जब चूहे कुतुर लेंगे
तुम्हारी अभिलाषाएँ
इंतजार को पूर्ण विराम लगा
करेंगीं चिर विश्राम
बूढी हड्डियाँ
तब आओगे
कहो कब आओगे? 

Wednesday, April 20, 2011

सोचती हूँ यदि दर्द के काँटे न होते तो ये आँसूं कहाँ ठहरते. पीड़ा की नदी वेग से चलती जरुर पर ठिकाने नहीं मिलते. जीवन दर्द के काँटों, पीड़ा की नदी और आँसुओं की गठरी समेटे पथरीली राहों पर चलता  है और फूलों की चाह रखता है . दर्द के इसी जज्बे को शब्दों ने आज पनाह दी है-
 
साँवली  रात
की सिलवटों में
 खोये रहते थे हम
और पहरे पर होता चाँद
खुल चुकी हैं
सिलवटें
अब तो ,
और घायल है चाँद
------------------------------------------
सौप के खुशबू
दर्द  ने
बढाया सदा हौसला मेरा
आज जो मुड के देखा
वो भी
हाथों में कांटे लिए खड़ा था
-----------------------------------------
चाँद
जिसे आगोश में ले
जी भर रो लेती थी
अँगुलियों की झिर्री से
कूद कर बोला
बरसात का मौसम
भाता नहीं मुझे
-------------------------------------
आज फिर
उतरी है
मोहब्बत दरिया में
आज फिर डूबेगा
नाम कोई
कहते हैं
प्यार
करने वालों को
पक्के घड़े
नहीं मिलते
------------------------------
 

Saturday, February 12, 2011

ठण्ड की सिमटी रातों में शब्दों को विस्तार मिलता है और वो भावनाओं के पख लगा उड़ने लगते हैं उन्हीको पकड़कर कविता में ढाल दिया है-
1.
चाहत की गर्मी से
पिघले थे अरमान
और धुंआ
खोहरा बन छा गया था
उसकी कालिख
दिल के दीवारों पर
आज भी दस्तक देती है
2.
हफ्ते भर
घर में बंद रहने के बाद
सूरज ने खिड़की खोली
ठण्ड में  सिकुड़ी एक किरण
पड़ी जो बर्फ पर
स्वयं उसकी आँख चुंधिया गई
वो ढुंढने लगा
एक टुकड़ा बादल
 3.
ठंढा सफ़ेद हवा का झोका
मेरी हड्डियों को
गुदगुदा गया
सुनाई दी एक आवाज तभी
बेटा स्वेटर पहन लो
लग जाएगी ठण्ड
औए मैने जैकेट उठा ली
4.
सर्द कोहरे को ओढ
ठिठुरता  गुलाब
ढूंढ़ रहा था
अपनी महक ,
अलसाई पंखुड़ियों में शबनम
और अपना वजूद
तभी क्रूर हाथों ने
उसे डाली से अलग कर
खोज को विराम देदिया
4.
धुन्ध को ओढ़ मै
कई दिनों से
ढूंढ़ रही थी सूरज को
आकाश के किनारे
एक कराह सुनी
देखा तो सूरज घायल पड़ा था
पूछने पर बोला
तानो और गलियों से ज़ख़्मी हूँ
जो लोगों ने
गर्म मौसम मे दिए थे मुझे
5.
पिछली सर्दी मे
हथेली  की गर्मी
तुम्हारी चौखट पर छोड़ आई थी
आज दस्तानो मे भी
हाथ गर्म नहीं होते
6.
तुम्हारी यादों की सिहरन
जो मुझमे उतरी
ओस मे डूबे गुलाब
तुम्हारे सपनो पर रख आई
उनकी खुशबु से
आज भी मेरी हथेलियाँ महक जाती है
 7.
हमारे रिश्ते की म्रत्यु पर
भिजवाये थे तुमने
कुछ बर्फ के फूल
उन्ही फूलो की कब्र पर
आज धुन्ध  ने पैहरे बैठाएं हैं


Monday, January 17, 2011

स्वयं को जानने के लिए

स्वयं को जानने के लिए
हम देखते हैं
बुजुर्गों की तस्वीरें।
रौब दार मूँछे,
घूँघट की मासूम हँसी
और झुर्रियों की दरारों में
हम ढूँढ़ते हैं
अपनी समानताएँ।
संदूक में
फिनायल गोली के साथ रखे
उनके शादी के जोड़े ,
काली पड़ी जरदोजी की साड़ियाँ,
पीली पगड़ी,
पुराने जेवरों की गठरी।


ये चीजें
हमारी धरोहर बन जाती हैं
इनमें महकती हैं
उनकी गाथाएँ
रीतियाँ,
जो सजाती हैं रंगोली
रोपती हैं आँगन में
तुलसी का बीरा
इनको
वो सौंपते हैं
आने वाली पीढ़ी को।
तीज, त्यौहार,रिश्तों के मौसम
अतीत बुनता है,
उस की एक नाजुक सी डोर
सौंपता है
वर्तमान को
हमारे चारों ओर
फैल जाते हैं संस्कार
और हम धनी हो जाते हैं।


वो बताते हैं
भूख पीढ़े की
घात अपनों की
सही नहीं जाती
उन्होंने सिखाया
सच के पन्ने भूरे हुए
पर अभी भी धडकते हैं
ये गुनगुनी बातें
सर्द परिस्थियों में
लिहाफ बन जाती हैं।


वो कतरा-कतरा
हममें ढलते हैं
शब्द, संस्कार, आकार
और वसीयत बन के
वो मरते नहीं, जब देह त्यागते हैं
अंत होता है उनका,
जब यादों के दरख्तों पर
खिलते है बहुत से फूल
पर उन के नाम का
एक भी नहीं।

अनवरत

कभी कभी मन के सीप में स्नेह का मोती पनपने लगता है और यही उपज  विचारों की लम्बी फेहरिस्त थामे सामने आ खड़ी होती है. तब अनायास की कविता का जन्म होता है-


मै मांगती  हूँ 
तुम्हारी सफलता 
सूरज के उगने से बुझने तक 
करती हूँ 
तुम्हारा इंतजार 
परछाइयों के डूबने तक 
दिल के समंदर में 
उठती लहरों को 
 रहती हूँ थामे 
तुम्हारी आहट तक 
खाने में 
परोस के प्यार 
निहारती हूँ मुख 
 महकते शब्दों के आने तक 
समेटती हूँ  घर 
बिखेरती  हूँ  सपने 
दुलारती  हूँ  फूलों  को 
तुम्हारे  सोने  तक 
रात  को  खीच  कर   
खुद  में  भरती  हूँ  
नींद  के शामियाने में 
 सोती हूँ जग-जग के 
तुम्हारे उठने तक 
इस तरह 
पूरी होती है यात्रा 
प्रार्थना  से  चिन्तन  तक।  

Monday, December 13, 2010



कभी कभी दीप का प्रकाश ह्रदय के अन्धेरों से हार जाता है .आंसू तेल बन भी जलते हैं कभी, पर सुख की आंच नहीं बन पाते-



प्रेम की बाती बन
मै अकेली जलती रही
शब्दों की हवाओं से बची
पर अब वो आंधियां बन चुके हैं
हाथों के घेरों से
हो सके तो
मुझे बचालो
 
माटी के दिए ने सोखा
मोहब्बत का तेल
सुखी बाती भभक के जली
और राख होगई
वो दिए को
उम्मीद के पानी से
सीचना भूल गई थी 

तुम्हारे  प्रेम की
जिस आंच से
जलाया था
उस रोज दिया
वो आंच अब कहीं और महकती है
अब हर बार
दोवाली अँधेरे में बीतती है

Tuesday, July 13, 2010

आँखों में अटका था बस एक ही सपना

अपनी अभिलाषाओं की आहुति दे हमें सुख की चाशनी परोसते  रहे. उनकी आँखों में सपने भी हमारे ही पलते रहे, सूरज की किरण थामी तो हमारे लिए, चांदनी खीच आँगन उतारी तो हमारे लिए और हम दामन फैला उन्हें थाम भी न सके अपनी दुनिया को अपने तक समेट उनकी पहुंच से दूर होते गए. आज ये हर घर की कहानी है. इसी तड़प से उपजी ये कविता-




पहनी
मोची से सिलवाई चप्पल
के दे सके
तेरे पैरों को जूते का आराम
फटी कमीज़ तो चकती लगा ली
ताकि शर्ट तुम्हारी सिल सके
पंचर जुड़ी साईकिल पर चलता रहा
टूटी गद्दी पर 
बांध कपडा काम चलता रहा
ताकि खरीद सके
वो पुरानी मोटर साईकिल तुम्हारे लिए
तागी थी जिस धागे से रजाई
उनकी  उम्र पूरी हुई
रुई भी खिसक के किनारे हुयी
ठंडी रजाई में सिकुड़ता रहा
के गर्मी तुझ तक पहुँचती रहे  
जब भी जला चूल्हा
तेरी ही ख्वाहिशें पकी
उसने खाया तो बस जीने के लिए
जीवन भर की जमा पूंजी
और कमाई नेक नियमति
अर्पित कर
तुझ को समाज में एक जगह दिलाई
पंख लगे और तू उड़ने लगा
ऊँचा उठा तो
पर ये न देखा
के  तेरे पैर उन के कन्धों पर है
उन के चाल की सीवन उधड गई
तेरी रफ़्तार बढती रही
सहारे को हाथ बढाया
तुमने लाठी पकड़ा दी
उनकी धुंधली आँखों से
ओझल  होगया
वो घोली खटिया पर लेटे
धागे से बंधी ऐनक सँभालते
तेरे लौटने की राह देखते रहे
अंतिम यात्रा तक
आँखों में अटका था
बस एक ही सपना
साबुत चप्पल ,नई कमीज़ और एक साईकिल

Thursday, December 10, 2009


कुछ करने का जज्बा जब दिल में हिलोरे मारने लगता है तो सामाजिक परिस्थितियां इन लहरों पर बांध कसने लगती है इन बाधाओं को पार कर कुछ लहरें जो उन्मुक्त बह ,आस दूसरों की छोड़, हरितमा फैलातीं है या कोशिश भी करती हैं तो कुछ तेजाब विचार उन को झुलसा देते हैं.

राम के आने की राह



छोड़ पराई आस
खुद कुछ करने की चाह में
सूरज की खिड़की बंद की
तो तपती धरती को शीतलता मिली
बादल में सेंध लगाई
प्यासे खेतों की प्यास बुझी
नदी की तरंगों को सी दिया
तो डूबे घरों ने साँस लिया
किसान की आशा फली
घर अनाथ होने से बचा
शहरी हवाओं में गांठ लगा दिया
तो बूढ़ा पीपल मुस्कुरा दिया
उन्नति की राह खुली
तो उम्मीदें लौट के घर चलीं
नम हुई बूढ़ी पलकें
ढलती उम्र ने सहारा पाया
मेरे माथे पर
कापतें हाथों ने आशीष सजाया
फैला अपने डैने
मैं जो मौज में उड़ने को था
के कुछ ज़मीनी भगवानों की
 क्षुद्र सोचों ने
क़तर दिए पंख मेरे
आत्मा तक नोच
मेरे उत्साह तो खुरेद डाला
बहुत चला था रामराज्य लाने
कह के धूल में पटक दिया
मैं भी जटायु सा पड़ा धरा पर
राम के आने की राह देखने लगा 

Tuesday, November 17, 2009

शोर

चहुँ और है शोर बहुत
भीतर बाहा हर ओर
तभी सुनाई नही देती
हिमखंड के पिघलने की आवाज़
गाँव के सूखे कुंए की पुकार
धरती में नीचे जाते
जल स्तर की चीख

बटवारा

घर, धन, वृद्ध आश्रम के खर्चे
यहाँ तक कि कुत्ते भी बटें
पर पिता के त्याग ,प्यार
माँ के आँसू ,दूध ,और पीडा
का कुछ मोल न लगा
क्योंकि पुरानी,घिसी चीजों का
कुछ मोल नही होता

Monday, October 5, 2009

वर्षा

वर्षा कुछ यूँ भी आँखों में उतरती है .संग  बहा लाती है कुछ शब्द .उन्हीं को पिरो के बनी है ये कविता


वर्षा दे  जाती है
कुरकुरे गुनगुने से सपने
कुछ पुरानी गीली यादों के
वर्षा जलाती है 
मन में स्नेह दीप
गर्माहट इसकी
देह में उर्जा का संचार करती है
अभिलाषा
तुम्हारी  निगाहों के छुअन की
बलवती हो जाती है
वर्षा देती है जन्म
एक अमर प्रेम को
बूंद - धरती ,पात - हरितमा
बिजली और बादल
के प्रणय की साक्षी होती है
वर्षा बरसती है घर में
धो देती है काजल
आंसुओं में घुल
नमकीन हो जाती है
वर्षा
भर देती है नदी ,
कच्चे घडे और प्रेम के बीच 
डुबो देती हैं उन्हें
चिर जीवित करने के लिए
वर्षा दे जाती है
कुरकुरे गुनगुने से सपने
पर नींद छीन लेती है

बारिश के ये दिन

जीवन में जो चीज हमसे दूर हो सदा उसकी कमी खलती है. बारिश, जो भारत में  साथ थी, यहाँ भी है पर दोनों में  बहुत अंतर है. बूंदों के संगीत पर थिरकने, सूरज की बादल संग आँख मिचौली देखने के पल अब हमारी हथेली में बंद नहीं है. पता नहीं समय हमारे साथ बह रहा है या मै समय के साथ पर एक क्षण को भी जो अतीत में झांक पाती हूँ ऐसा ही कुछ याद आता है-

उफ़ बारिश के ये दिन
पानी में  कश्ती बहाने
छपाक से दूसरो को भिगाने
रेन कोट पहने के सुन्दर बहाने 
छतरी लगा के इतराने के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
जब छत पर भीगा करते थे
बूंदों के संग अठकेलियाँ  कर
गीत नया गया करते थे
माँ कि डांट कि भी
कहाँ परवाह किया करतें थे
वो बेफिक्री के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
बारिश कि पहली फुहार से
उठती थी माटी कि खुशबु 
पूरी गलियां महक उठतीं
पत्ती पत्ती डाली डाली सजती
मन में  बसी है आज भी वो खुशबु
वो नरम गरम से दिन
उफ़ वो बारिश के दिन
रिमझिम फुहार के बाद
ठेले पर भुट्टे भुनवाना
भीगते हुए उनको खाना
याद है आज भी वो सोंधा  स्वाद
वो स्वादों के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
घिरते थे जो मेघ
मन में  सोचा करते थे
बरसे उमड़ घुमड़ इतना
के आजाये सड़कों पर पानी इतना
हो जाये रेनी डे 
 दुआं यही  माँगा करते थे
वो छुट्टी पाने के दिन 
उफ़ वो बारिश के दिन
रात में  बदल कि गड गड़ से
जब हम बहने डर जाया करते थे
पकड़ के एक दुसरे को
माँ को  बुलाया करते थे
वो माँ के संग सोने के दिन
उफ़ ये बारिश दिन
बारिश में जब जाती थी बिजली
टटोलते टटोलते मचिश , मोमबत्ती ढूँढा करते थे
फिर सारा घर इकठा होके
उस पिली हलकी रौशनी में
हंसते हंसते खाते और खाते खाते हंसते थे 
 फुर्सत के लम्हे पकड़
अन्ताक्षरी   खेला करते थे
वो अपनेपन के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
न वो सोंधी खुशबु है न माँ का साथ
न डर में  पकड़ने को बहन का हाथ
बरखा में  भीगने का समय भी अब कहाँ है
सब कुछ तो है यहाँ पर वो सुख कहाँ है
फुर्सत के पल भी नहीं,बूंदों को पकड़ने कि तम्मना भी नहीं
फिर भी है आज बारिश के दिन

Sunday, October 4, 2009

प्यार को जो देख पाते

भैया
काश तुम समझ पाते
पापा की झिड़कियों मे था
तुम्हारा ही भला
उनके गुस्से मे छुपे
प्यार को जो देख पाते
तो शायद
तुम घर छोड़ के नही जाते
पापा के ठहाकों से
जो गूंजता था घर कभी
आज उनकी
बोली को तरस जाता है
तुम्हारे कमरे मे
बैठे न जाने क्या
देखते रहते हैं
अकेले मे कई बार
बाते करते हैं
पापा अब बुझ से गए हैं
उनकी डाट को
गांठ बाँध लिया
पर न देखा की
तुम्हारी सफलता को
मेरे बेटे ने किया है
बेटे को मिला है
कह के
सब को कई बार बताते थे
तुम्हारे सोने के बाद
तुम्हें कई बार
झाक आते थे
क्यों नही
देखा तुम ने
के खीर पापा कभी
पूरी कटोरी नही खाते थे
तुम्हारी पसंद के
फल लाने
कितनी दूर जाते थे
आपने वेतन पे लिया कर्ज
तुम्हारी मोटर साईकिल लाने को
काम के बाद भी किया काम
तुम्हें मुझे ऊँची शिक्षा दिलाने को
तुमने उन्हें दिया
मधुमेह ,उच्च रक्तचाप ,
छुप के रोती
आंखों को मोतिया
लेली उनकी मुस्कान
उनकी बातें
उनका गर्व से उठा सर
और सम्मान
यदि तुम ये सब जानते
तो शायद नही जाते
आजो
इस से पहले
के कंही देर न हो जाए
पितृ दिवस पे तो पिता को
बेटे का उपहार दे जाओ
तुम आजो

Friday, October 2, 2009

भारत

भारत दो हिस्से में जीता है
एक हिस्से में
बड़ी बड़ी कोठियां है
व्यापारी, नेताओं, अभिनेताओं की
एक हिस्से में
झुग्गी झोपडियां
फुटपाथ पे सोते लोग
एक घर की आस में
जीवन जीता मध्यमवर्गीय इन्सान
एक हिस्से में
शान्ति दूत गाँधी के शब्द
तो दूजे में
गोधरा अहमदाबाद दंगों से
विश्व मानचित्र पे
शर्मिंदा भारत
एक हिस्से में
लाल बत्ती पे रुकी कार में
पिज्जा चाकलेट खाते बच्चे हैं
तो एक हिस्से में
हाथ में कपड़ा ले
गाड़ी पोछते
ललचाई निगाहों से देखते
भूखे बच्चे
एक हिस्से में
ऐश्वर्या शुश्मिता
विश्व में जाना पहचाना नाम
एक हिस्से में
लुटी अबरू
दहेज़ में जलती बेटियाँ
और
कोख में मार दी जाती बच्चियां

Monday, September 28, 2009

विस्फोट

दर्द चीखा
लहू बहा
शहर काँपा
दुनिया के नक्शे पे
भारत थरथराया
राम हुआ शर्मिंदा
रहीम ने सर झुकाया



2.

लाशों की भीड़ में
खड़ी
माँ भारती रो रही
चिता जलाऊँ किस के लिए
बनाऊँ कब्र किसकी
मानव मानवता
धर्म धार्मिकता
देश देशभक्ति
है कौन यहाँ
हुई हो न मौत जिसकी


शरद ऋतू

ग्रीष्म में तपते
साये ,जलते मन
सुलगती हवाएं
शरद ऋतू के आगमन पे
हर्षित हो जायें
गुलाबी ठण्ड की
आहट लिए
प्रकृति का करता सिंगार
शरद ऋतू की सुषमा
है शब्दों से पार
श्वेत नील अम्बर तले
नव कोपलें फूटती है
कमल कुमुदनियों
की जुगल बंदी से
मधुर रागनी छिड़ती है
भास्कर की मध्यम तपिश
सुधा बरसाती चांदनी
धरती के कण कण में
प्रेम रस छलकाती है
मौसम की ये अंगडाई
विरह प्रेमियों के ह्रदय में
टीस सी उठाती है

Sunday, September 27, 2009

गिलहरी की बात

वो छोटी अमेरिकन गिलहरी
हमारे देश की
गिलहरियों से अलग
मोटी ताजी
स्वतंत्र ,भय मुक्त
इक्क्षाओं से भरी
बार बार पेड़ से उतरती
कागज़ उठाती
जतन से मुहँ में दबाती
पेड़ पे बने घोसले में
रख आती
समाप्त हुए कागज़
घुमाई दृष्टि इधर उधर
देखा
थे दूसरे पेड़ के नीचे कुछ
झबरीली पूंछ हिलती
दौडी उस को उठाने को
उसी पेड़ से उतर
गिलहरी दूसरी
आई इसे भागने को
ये आती
वो भागती
मैं देख रही थी तमाशा सब
अचानक सुना मैने
ये गिलहरी बोली
क्यों भगा रही हो मुझे
क्या तुम को भी है लगी
हवा भारत की
जो मै एक क्षेत्र से
क्षेत्र दूसरे जा सकती नही
सुन के शर्मसार हुई मै
चली गई गिलहरी
कागज उठा के
और मै सर झुका के

बेटी होने की खुशी


बेटी होने की खुशी
अब सिर्फ़
वेश्याएँ मनाएँगी
समाज के ठेकेदारों के घर
बेटियाँ कोख मे
दफ़न कर दी जाएँगी
काश!
गर्भ का अंधकार छोड़
वो दुनिया का उजाला देख पाती

खामोशी

आवाज़ मिलती है अंदाज मिलता नहीं
दूर तक राहों में चिराग कोई जलता नहीं    
पानी में है शोले और हवाएं नफरत की
फूल चाहत का अब कोई खिलता नहीं
कुरेद्तें है ज़ख्म हरा करने को
चाक   जिगर अब कोई सिलता नहीं
उस बस्ती में इतजार का है मतलब क्या
लाख चीखने पर भी दरवाजा जहाँ खुलता नहीं
कुछ यूँ बेनूर हुए है गाँव हमारे
के पत्ता भी अब कहीं खिलता नहीं
देती रही  माँ देर तक आवाजें उस को
जाने वाला कभी रुकता नहीं  नहीं

Monday, January 5, 2009

दुआ

सूखे से तरसी आंखों ने
मांगी दुआ वर्षा की
पानी बरसा और बरसता ही चलागया
सब कुछ बहा गया
कुछ यूँ कबूल होती है
दुआ गरीबों की

दीवाली

कहा उस ने
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
अपने संग होने की
खुशियों में समायें
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
हाथ पकड़
दिए के पास लाई
जलाने को जो उसने लौ उठाई
तभी देखा
दूर एक घर
अंधेरों में डूबा था
बम के धमाके से
ये भी तो थरराया था
आँगन में उनके
करुण क्रन्दन का साया था
पड़ोस डूबा हो जब अन्धकार में
तो घर हम अपना कैसे सजाएँ
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं?
कर के हिम्मत उसने
एक फुलझडी थमाई
लाल बत्ती पे गाड़ी पोछते
उस मासूम की
पथराई ऑंखें याद आई
याचना के बदले मिला तिरस्कार
पैसों के बदले दुत्कार
घर में जब गर्मी न हो
वो पटाखे कैसे जलाये
जब है खाली उसके हाथ
हम फुल्झडियां कैसे छुडाएं ?
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं ?
जब खाया नही
तो दूध कहांसे आए
छाती से चिपकाये बच्चे को
सोच रही थी भूखी माँ
मिठाइयों की महक से
हो रही थी और भूखी माँ
खाली हो जब पेट अपनों के
कोई तब जेवना कैसे जेवे
अब तुम ही कहो प्रिये
दिवाली हम कैसे मनाएं?
भरी आँखों से
देखा उसने
फ़िर लिए कुछ दिए ,पटाखे मिठाइयां
संग ले मुझको
झोपडियों की बस्ती में गई
हमारी आहट से ही
नयन दीप जल उठे
पपडी पड़े होठ मुस्काए
सिकुड़ती आंतों को
आस बन्धी
अंधियारों में डूबा बच्पन
आशा की किरण से दमक उठा
अमावस की काली रात में
जब प्रसन्नता की दामिनी चमक उठी
तो अब आओ प्रिये
दीवाली हम खुशी से मनाये
सुनो न
दीवाली हम सदा एसे मनाएं

Friday, January 2, 2009

जिन्दगी यूँ ही चलती है

जीवन अपनों का सजाना तो है
रेत में ही सही पर घर बनाना तो है

हाँ मालुम है के तूफान का अन्देशा है
मौजों में कश्ती फ़िर भी बहाना तो है

भूख के आगे पलट जाते हैं हर एक तूफान
इस बात का ख़ुद को यकीं दिलाना तो है

हर सीप में मोती मिलता नही दोस्तों
सुना हमने भी ये फ़साना तो है

समां गए कितने लहरों में उस रोज
उजडे इस चमन को फ़िर से बसाना तो है

भूखे रह जायें या सो जायें वो पीके पानी
क़र्ज़ बनिए का फ़िर भी चुकाना तो है

बहुत रो लिए तुम सुन के दास्ताँ मेरी
तेरे इन आसुंओं को अब हँसाना तो है

समुन्दर न सही समुन्दर सा हौसला तो दे
ज़िन्दगी से रिश्ता हम को निभाना तो है

सब कुछ खो के बुत सा बैठा है वो
घाव बन न जाए नासूर उस को रुलाना तो है

Thursday, January 1, 2009

महंगाई

विरोधी नेता
माल दबा दाम बढाते हैं
इसी की सीधी चढ़
सत्ता में आते हैं
गद्दी पे बैठ
बहुत मंहगे हो जाते हैं
महंगाई से दीखते है चहुँ ओर
पर आम जनता की पहुँच से
दूर हो जाते हैं

महंगाई सब को
सरे आम लूटती है
पर रपट इसकी
किसी थाने में
नही लिखी जाती है
इसी लिए शायद
ये बेखौफ बढती जाती है

एक गरीब माँ
बच्चों को
फल के नाम बता रही थी
खरीद सकती नही
इसी लिए
दूर से दिखारही थी

महंगाई स्वयं महंगी हुई
पर रिश्ते सस्ते हो गए
गिरा दाम इमान का
जज्बात नीलाम हो गए
सस्ती बिकने लगी हैं बातें
जान इन्सान की सस्ती होगी
कम हुई कीमत किसानों की
बचा आत्महत्या की केवल रास्ता है
इस मंहगाई के दौर में लोगों
ये ही तो है जो सस्ता है

Saturday, November 15, 2008

समीकरण

माँ पिता पालते हैं
चार बच्चे खुशी से
पर चार बच्चों पे
माँ पिता भारी है
ये कलयुग का समीकरण है

Thursday, November 13, 2008

देश

बदलना चाहो भी तो बदल न पाओगे ज़माने को
बैठे हैं भेष बदल दरिन्दे कोशिश मिटाने को।

बाणों से बिंधा देश है कब से चीख रहा
कोई तो दे दे सहारा मेरे इस सिरहाने को।

सही न गई जब भूख अपने बच्चों की
हो गई खड़ी बाज़ार में ख़ुद ही बिक जाने को।

बूढी आँखें राह तक तक के हार गईं
लौटा न घर कभी गया विदेश जो कमाने को।

विधवा माँ की भूख दवा उम्मीद है जो
कहते हैं क्यों सभी उसे ही पढाने को।

नन्ही उँगलियाँ चलाती है कारखाने जिनके
छेड़ी उन्होंने ही मुहीम बाल मजदूरी हटाने को।

अपनो ने किया दफन गर्भ में ही उस को
तो क्या जो वो चीखती रही बाहर आने को।

Wednesday, November 5, 2008

पुनर्जन्म

जब भी मैं आइना देखती हूँ
चेहरे पर वक़्त की छाया देखती हूँ
गालों की इन लकीरों में छुपी
समय की गर्द को धीरे से छूती हूँ
उसे हटाने की नाकाम कोशिश करती हूँ
और बहुत दुखी होती हूँ

उम्र से लड़ते लड़ते मै हार गई
और सिलवटें चेहरे पर अपना घर बना गई
कुमारी से श्रीमती और श्रीमती से माँ के सफ़र में
मैं तो कहीं खो ही गई
अचानक
माँ माँ की आवाज़ से सोच टूटी मेरी
बेटी जो घुटनों तक आती थी
आज ऊँगली पकड़ बुलाती थी मेरी
व़क्त जो चेहरे पर झुर्रियाँ बना रहा था
वही मेरे ज़िगर के टुकडों की उमर भी बढ़ा रहा था
नन्ही हथेलियाँ अपनी लकीरें बना रहा थी
पर एक माँ के माथे पर
गर्व की एक और गाथा भी गा रही थी
इन्हे बड़ा होते देखने में जो खुशियाँ हैं
माँ के लिए तो वही उसकी सारी दुनिया है
मासूम आखों के आईने में
अपने खोये समय को देखती हूँ
छोटी होती हूँ, जवान होती हूँ और उमर दराज़ हो जाती हूँ
फिर से आइना देखती हूँ चेहरे की इन लकीरों को देखती हूँ
पर अब में खुश होती हूँ
क्योंकि इन रेखाओं में
अपनी आत्मा, अपने बच्चों को बड़ा होती देखती हूँ

Wednesday, October 1, 2008

गरीब

बाबा क्यों बैठे हो उदास और हताश
दुनिया से या ज़िन्दगी से हो निराश
किसी से नही मै मौसम से हूँ बेजार
निगोड़े की वजह से ज़िन्दगी हो गई तार तार
जब चाहिए पानी बरसता ही नही
बरसता है तो फ़िर रुकता ही नही
सूखे और बाढ़ के कहर से
टूटी है कमर कुछ इस कदर
रस्सी बेचने निकला हूँ इधर
सुबह से हो गई शाम
बोहनी तक तो हुई नही
नायलोन के आगे
सन की रस्सी कोई खरीदता ही नही
बाबा दर्द तुम्हारा जानती हूँ
पर एक खुशी की बात बताती हूँ
हमने चंद्र यान भिजा है चाँद पे
भारत सब को बता रहा है शान से
चलो बढ़िया है
मुला इस से होगा क्या
क्या समय से पानी बरसेगा
भूख से कोई न तरसेगा
क्या हमरे बिटवा की होसकेगी पढ़ाई
बिटिया हमरी जायेगी ब्याही
बाबू की खासी को मिल सकेगा आराम
सब हाथों को मिल सकेगा काम
हमरी धन्नो की का होसकेगी दवाई
अम्मा को का देने लगेगा दिखाई
चुका पाएंगे क्या हम महाजन का क़र्ज़
कुकुर और हम में नही है कौनो फर्क
मेरे पास इन बातों का न था कोई जवाब
करा के उस की बोहनी
उठ गई वहां से चुप चाप