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Thursday, August 30, 2012

कभी कभी कोई दर्द इतना गहरे बैठ जाता है की उसकी जलन शायद जीवन भर महसूस होती रहती है . ..किसी अपने से दूर होने के कारण आँखें उसको देख नहीं पाती पर महसूस कर पाती है वही भावना शब्दों का सहारा ले कर आज यहाँ उतर आई है .


क्यों होजाता है अकेला ?

जीवन भर
समय की ट्रेन
पकड़ने को
भागते रहे कदम
भोर से धुंधलके  के बीच
काम और अपमान  की
 दोधारी तलवार पर
चलते रहे l
लू  की  जलन
ठण्ड की पपड़ियाँ
छिलती  गईं देह
पर तुम्हे
ये ज़ख्म देखने की
फुर्सत कहाँ थी
तुम तो पूरी करते रहे
 उम्मीदों की भी उम्मीद
अपने ही चरागों  की
भटकती लौ को
 सहारा देते तुम्हारे हाथ
अपमान के फफोलो से भर गए
फिर भी
घर को
बचाने के लिए 
तुम नीव का
वो  पत्थर बने
जिसकी सराहना किसी ने नहीं  की
चक्की
में  पिसता रहा
तुम्हारा श्रम
पर भूख
किसी की शांत न हुई
सब कुछ दे कर भी
एक पुरुष
क्यों होजाता है अकेला
अपने अंतिम  पलों में ?

25 comments:

Rakesh Kumar said...

ओह!
बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति है आपकी रचना जी.

मेरे ब्लॉग पर आपके आने का हार्दिक आभार जी.

यदि हो सके तो मुझे आप अपना फोन/ईमेल सम्पर्क दीजियेगा.अगली बार अमेरिका आना होगा,तो आपसे
अवश्य सम्पर्क करते हुए आऊंगा.आपसे मिलकर बहुत ही खुशी होगी मुझे.

रश्मि प्रभा... said...

तुम तो पूरी करते रहे
उम्मीदों की भी उम्मीद
अपने ही चरागों की
भटकती लौ को
सहारा देते तुम्हारे हाथ
अपमान के फफोलो से भर गए
फिर भी
घर को
बचाने के लिए
तुम नीव का
वो पत्थर बने
जिसकी सराहना किसी ने नहीं की .... फिर भी अचल अविराम तुम हो चलायमान

expression said...

आह!!!

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति...

अनु

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

संवेदनशील, भावपूर्ण रचना ...जाने क्यों होता यही है....

जयकृष्ण राय तुषार said...


जीवन भर
समय की ट्रेन
पकड़ने को
भागते रहे कदम
भोर से धुंधलके के बीच
काम और अपमान की
दोधारी तलवार पर
चलते रहे l
लू की जलन
ठण्ड की पपड़ियाँ
छिलती गईं देह
पर तुम्हे
ये ज़ख्म देखने की
फुर्सत कहाँ थी
बहुत ही खूबसूरत कविता |ब्लॉग पर आने हेतु आभार

रचना दीक्षित said...

काफी समय के बाद आपको पढ़ने का सौभाग्य मिला वह इतनी भावपूर्ण रचना के रूप में.

सचमुच यह अजीब पहेली है.

दिगम्बर नासवा said...

पुरुष की नियति को जानने का सफल प्रयास है यह रचना जो चुपचाप इसी कोशिश मिएँ लगा रहता ही की दीपक की लो मद्धम न पड़े ...

S.N SHUKLA said...

सुन्दर सृजन ,
सुन्दर पोस्ट, बधाई.

कृपया मेरी नवीनतम पोस्ट पर पधारने का कष्ट करें .

प्रेम सरोवर said...

भाव प्रवण कविता। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है।

KAHI UNKAHI said...

स्त्री होते हुए भी बड़ी खूबसूरती से आपने एक पुरुष का पक्ष बयान किया है...। एक खूबसूरत रचना के लिए मेरी बधाई...।

प्रियंका गुप्ता

mridula pradhan said...

wah......gazab ka.....

Saru Singhal said...

Very touchy and profound. Leaves you numb...

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

हृदयस्पर्शी भाव!

shikha varshney said...

सार्थक चिंतन है..पर प्रश्न में ही उत्तर भी छिपा है..भावपूर्ण सुन्दर अभिव्यक्ति रचना जी .

Naveen Mani Tripathi said...

अपने ही चरागों की
भटकती लौ को
सहारा देते तुम्हारे हाथ
अपमान के फफोलो से भर गए
फिर भी
घर को
बचाने के लिए
तुम नीव का
वो पत्थर बने
जिसकी सराहना किसी ने नहीं की
चक्की
में पिसता रहा
तुम्हारा श्रम

bahut sundar rachana ke sath sath aur 5 september birthday pr hardik badhai rachana ji

सहज साहित्य said...

हकीकत को बयान करती दिल को छूने वाली कविता । इन पंक्तियों में आपने जीवन का कटु यथार्थ अभिव्यक्त कर दिया है -चक्की
में पिसता रहा
तुम्हारा श्रम
पर भूख
किसी की शांत न हुई
सब कुछ दे कर भी
एक पुरुष
क्यों होजाता है अकेला
अपने अंतिम पलों में ?

Dr (Miss) Sharad Singh said...

अपने ही चरागों की
भटकती लौ को
सहारा देते तुम्हारे हाथ
अपमान के फफोलो से भर गए


मन को गहरे तक छू गई एक-एक पंक्ति...बहुत सुंदर रचना...

Saras said...

...जीतेजी ..सब कुछ जानते हुए भी हम कुछ नहीं कर पाते ...और उसके जाने के बाद यही सच जीवन भर सालता रहता है हमें ...बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तिथि है ...लेकिन यही जीवन का सच है ...

dheerendra said...

बहुत ही संवेदनशील भावपूर्ण प्रस्तुति,,,बधाई,,रचना जी.

RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

Kunwar Kusumesh said...

सुन्दर और भावपूर्ण अभिव्यक्ति.

रचना दीक्षित said...

रचना जी आजकल ब्लॉग पर सक्रियता बहुत कम है क्या बात है? सब ठीक तो है.

अल्पना वर्मा said...

एक पुरुष का दर्द स्त्री की कलम से !बहुत खूब .

भावों की सफल अभिव्यक्ति.

Suman Dubey said...

nmskar rachna ji sumdar shbd ki bgiya yah bel nari ke jivan se badi milti julti prtit ho rahi hai sabhar

Suman Dubey said...

rachna ji namskar, sundar shbdo se guthi ladiya aurat ke jivan jaisi bel hai,

Bob said...

भाव प्रवण कविता। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है।