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Friday, March 15, 2013


छत की मुंडेर
 पर बैठी मै
पैर  हिलाती हुई
अपने दर्द को
सहलाती पुचकारती
उससे पूछती हूँ
क्यों रे
मुझसे तेरा दिल न भरा
कभी तो मेरा साथ छोड़ा होता
वो खामोश सुनता रहा
मै नीचे उतर आई
आँगन से देखा
वो अभी भी मुंडेर
पर बैठा था .
उसने भरी आँखों से मुझे देखा
और छलांग लगा दी
मै चीख पड़ी
गली में
उसका वजूद
बिखरा पड़ा था
और मै
एकदम खाली  हो गई थी
क्योंकी मेरे अन्दर
उसके आलावा कुछ न था ......

9 comments:

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

बहुत उम्दा भाव लिये सुंदर प्रस्तुति,,,

बीबी बैठी मायके , होरी नही सुहाय
साजन मोरे है नही,रंग न मोको भाय..
.
उपरोक्त शीर्षक पर आप सभी लोगो की रचनाए आमंत्रित है,,,,,
जानकारी हेतु ये लिंक देखे : होरी नही सुहाय,

कुश्वंश said...

सुंदर प्रस्तुति

डॉ. मोनिका शर्मा said...

मर्मस्पर्शी .....

mridula pradhan said...

very nice.....

Saras said...

आपकी कवितायेँ अवाक् कर जाती है ......वाकई !

रचना दीक्षित said...

दर्द से मुलाक़ात और उसके बिछुडने का दर्द. बहुत संवेदनशील और मर्मस्पर्शी.

Anita (अनिता) said...

सच है! हम दर्द पाना नहीं चाहते हैं... मगर दर्द के बिना कितने खाली भी हो जाते हैं...
बहुत सुंदर भावाभिव्यक्ति!
~सादर!!!

Rachana said...

aapsabhi ka bahut bahut dhnyavad
sneh milta rahe yahi aasha hai
rachana

tejkumar suman said...

दर्द से आपकी मुलाकात , बहुत ही मर्म़स्पर्शी । बधाई।