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Monday, December 19, 2011

सूरज ने मई जून में मिले लोगों के तानो से परेशान होकर जो अपने किवाड़ बंद कर लिए .घुन्ध आकाश के आँगन से निकल घरती पर पसर गई .ठंढ हाथ रगडती हुई स्वेटर पहन इतराती घूमने  लगी ऐसे में कहीं कोई स्वयं को जीवित रखने के लिए कर रहा था प्रार्थना कुछ टुकड़े कम्बल के लिए .पर सुनी जाती है दुआ कब गरीबों की ................................


मौसम ने ओढ़ी
शीत  की चूनर
पारा  नीचे गिरता गया
छोटू ने पानी डाल
कोयले की आग बुझाई
तो शहर 
लिपट गया कोहरे में
ठंढ खुद इतनी ठंढी हुई
के बैठ गई उकडू
जलते अलाव के पास
सूरज ने  बढाया घर का तापमान
चाँद ने रजाई ओढ़ी ली
माँ ने थामी ऊन सिलाई
ठन्डे हाथों से
 वो बुन रही  थी फंदों में गर्माहट
कपड़ों की गठरी बने लोग
चल रहे थे
कम कर के शरीर का क्षेत्रफल
धुंध की महक वाली  हवा
फिर भी न जाने कैसे
कुरेद रही थी हड्डियों को
दूर बस्ती में
फटे कम्बल से
खुद को ढक रहे थे वो चारों
सुबह अख़बार में
छोटा सा लिखा था
शीत लहर से चार की मौत 

Thursday, December 1, 2011

तेरे आने से


जन्मदिन खास क्यों होता है ?शायद इसलिए कि बीते वर्षों का एक एक पल जीवित हो  सामने खड़ा होकर मुस्कुराने लगता है ,और बरबस ही सारी घटनाये आँखों में चित्र सी तैरने लगती हैं आज ऐसा ही कुछ हुआ जब बेटे को स्कूल जाने के लिए तैयार कर रही थी .तो उसके जन्म से ले कर आज तक की सारी  बातें भावनाओं में गुथ कर महकने लगी .,मन प्रार्थना करने लगा भगवान मेरे बेटे को लम्बी उम्र देना ,और अपनी कृपा सदा ही इसपर बनाये रखना .खुशियों का वो फूल खिलाना जिस पर पतझर का मौसम कभी न आये .


तेरे आने से
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उस रात
सूरज उगा था
मेरे आँचल में
तब  उजाले से भर गईं थीं मेरी आँखें
और मेरा कमरा
गुनगुनी खुशबु से महकने लगा था
पीड़ा की गठरी में से निकल
सुकून की तितलियाँ
उड़ने लगीं थीं मेरे चारो ओर
मेरी सोच और यथार्थ में ,
 परिवर्तन न था
तुमको देखा तो लगा
जानती हूँ हमेशा से
ईश्वर की इस दुआ से
गोद सजाई तो
उसके गुदगुदे पाँव
मेरी हथेलियों को पवित्र कर गए
जीवन का सन्देश देतीं
उसकी अधमुंदी आँखों की चमक
मेरे जीवन की मुंडेर पर
जुगनुओं सी सज गईं
आज स्कूल जाते
उन पाँच वर्षीय  नन्हे पैरों को
हौले से सहलाया  
उसको हुई थोड़ी गुदगुदी
और मेरी हथेलियाँ पुनः पवित्र हो गईं   

Friday, October 14, 2011

स्त्री अपने सिन्दूर के लिए टुकड़े टुकड़े बिखरे बादल को बटोर कर साया कर देती है सूरज अपनी गति कभी भी बदले धूप को अपने आँचल में समेट अँधेरे पथ को उजाले से भर देती है .स्नेह की दरिया आँगन में बहाने को नाजाने कितने व्रत उपवास रखती है .वो पूजती है तुम्हारे  एक एक शब्द को ,तुम्हारे अनुसार ढल कर तुम जैसी बन जाती है और तुमको पता भी नही चलता .
करवा चौथ आने को है उसी स्त्री के स्नेह रस में सजी एक पुरानी कविता आप सभी के सामने रखी है


अपने प्रेम को लिखने के लिए
शब्द ढूंढे
पर छोटे लगे
अलंकर ,संजा ,रस सब बहते रहे
फिर भी कुछ अधूरा रहा
मैने कागज पर
रख दिए लब
और कविता पूरी होगई
=======================
भावनाएं
जो उभरती है सिर्फ तुम्हारे लिए
सूरज में झुलसती ,बर्फ में पिघलती
बरसात में बहती है
पर तुम्हारी बांहों के लंगर में समां
शांत  होजाती है
महकने के लिए
------------------------------------------------
प्रेम रस से सीचती हूँ
अपने रिश्तों की जड़ें
तुम्हारे समर्पण से
वो गहरी, मजबूत  हो जाती हैं
संबंधो के वट वृक्ष को थामने के लिए
===================================
घटाओं से चुरा ,
कुछ बूंदें
तुमने रख  दीं  मेरे आँचल में
मैने पल पल समेटा उन्हें
और अंतर घट तक तृप्त हो गई
=====================================
कागज को ले हाथों में
मै सोचती रही तुम्हें
खोला तो देखा
उसपर लिखा था
प्रेम
============================================
प्रेम दरिया में बहते हुए
हम आये इतनी दूर
पीड़ा के दंश से
हर पल बचाया मुझे
पर तुम्हारे पांवों में छाले थे
और ज़ख़्मी थे हाथ
=========================

Tuesday, August 30, 2011

ताज्ज़मुल चाचा ,रहीमा फूफी ,सकीना आपा नाजाने ऐसे कितने ही रिश्ते ईद पर यादों की गिरह खोल बाहर आते हैं  और मेरी हथेली पर ईदी रख कर कहीं गुम  हो जाते हैं .आने लगती हैं मुझे सेवईयों की खुशबू ,सुनाई  देती है चूड़ियों की खनक और शीर खोरमा की याद मेरी स्वाद कलिकाओं को भिगो जाती है .जब भी माँ को फोन करो बिना पूछे बता ही देती है सकीना आपा की शादी होगई ,रहीमा फूफी बीमार है और ताज्जमुल चाचा .......................................................................



ईद मेले में
मै हरी चूड़ियाँ बन के बिका
तुम आयीं
और लाला चूड़ियाँ खरीद कर चली गईं
तुमको तो
हरा रंग पसंद था न ?
------------------------------------------

मूंद कर  मेरी आँखे
पूछा था तुमने
बताओ कौन हूँ मै?
उन यादों के पल
आज भी
मेरी अलमारी में सजे हैं
तुम कभी आओ
तो दिखाऊंगा
--------------------------------------------------
अचानक
मेरे बुलाने पर
चौंक कर पलटी थी तुम
और तुम्हारे मेहँदी भरे हाथ
लग गए थे मेरी कमीज़ पर
अब हर ईद पर
मै उसको गले लगता हूँ
आज भी इनसे
गीली मेंहदी की खुशबू आती है
--------------------------------------------------------
बादल  के परदे हटा के
झाँका जो  चाँद ने
मुबरक मुबारक !!
के शोर से सिमट गया
सोचा ,
निकलता तो रोज ही हूँ
पर आज ..................
उसे क्या मालूम
के वो ईद का चाँद है
-------------------------------
तुमने ,
उस रोज
मेरे कानों में
हौले से कहा था
'ईद मुबारक '
अब ,
जब भी देखती हूँ ,
ईद का चाँद
खुद ही कह लेती हूँ
ईद मुबारक
-------------------------------

मैने
अब्बा के आगे
बढाया जो ईदी के लिए  हाथ
गर्म मोती की दो बूंदों गिरीं
और  हथेली भर गई
आज भी हर ईद पर
गीली हो जाती है हथेली
-------------------------------------

सेवईयाँ लाने
गया था बाजार वो
और ब्रेकिंग न्यूज बन गया
अब इस घर में
कभी सेवानियाँ नहीं बनती

Friday, July 29, 2011




वो स्वयं टूटती है, पर रिश्तों को जोड़े रहती है l.बिखरती है ,लेकिन पूरे घर को समेटे रहती है l स्थान ,समय ,और परिस्थितियाँ  उसका प्रारब्ध नहीं बदलते  l  अपने अन्दर की उर्जा को खर्च कर बहुत कुछ करती है ....जब तक कर पाती है ............


  एक औरत    



एक औरत
जब अपने अन्दर खंगालती   है
तो पाती है
टूटी फूटी
इच्छाओं की सड़क ,,
भावनाओं का
उजड़ा बगीचा ,
और
लम्हा लम्हा मरती उसकी
कोशिकाओं  की लाशें  
लेकिन
इन सब के बीच भी
एक गुडिया
बदरंग कपड़ों मे मुस्काती है
ये औरत
टूटती है ,बिखरती है
काँटों से अपने जख्म सीती है
पर इस गुडिया को
खोने नहीं देती 
शायद इसीलिए
तूफान  की गर्जना को
गुनगुनाहट में बदल देती है
औरत




यही कविता रचनाकार पर 
 
http://www.rachanakar.org/2011/07/blog-post_5925.html  

Tuesday, July 5, 2011

कहा उसने , डाली से टूट कर पत्ता सदैव भटकता रहता है .मासूम कदमो के नीचे यदि माँ की हथेली न हो तो वो पाँव जीवन भर जलते रहते हैं .ऐसे ही किसी की कुछ बातें सुनी तो ये शब्द कविता के जामा पहन मेरी हथेलियों में दुबक गए .

क्षणिकाएँ  
 

बच्ची  के मुट्ठी में
माँ का आँचल देख
अपनी हथेली सदैव
खाली लगी
--------------------------------

माँ पर कविता लिखूँ कैसे
मेरे पास है
एक  तस्वीर
जिसे माँ बताया गया
और कुछ फुसफुसाते  शब्द
"बिन माई कै बिटिया "
================================


ये दीवारे ,ये आँगन
जानते हैं मुझे
पर ये मेरे नहीं है
बहुत से लोग है यहाँ
लेकिन रिश्तेदार नही
ये बड़ी ईमारत
घर नहीं, पर घर है
इस  के ऊपर लिखा है
'अनाथाश्रम '
=========================

Wednesday, June 8, 2011

सच जब  बोलना  चाहता है ,तो हजारों हाथ उसके पंख नोच धरा पर पटक देते  हैं l जो सच इस दर्द को सह नहीं पाता वो दम तोड़ देता है या फिर खुद को बिकता हुआ देखता रहता हैl


सच  

मै सच को खोजने निकली
देखा ,नोटों के नीचे दबा था
कहीं झूठ की चाकरी कर रहा था
तो कहीं ,
 टूटी झोपडी के कोने में
घायल पड़ा था
पूछा- ये कैसे हुआ ?
कहने लगा -
मैने बोलने की कोशिश की थी ।

Sunday, May 22, 2011

माँ की चाहत पानी बन नदी में उतरती तो है पर भीगती नहीं .कभी कभी भीड़ में अकेली होती है और कभी अकेलेपन में भी एक भीड़ अपने आसपास जमा कर लेती है  माँ एक एसा  ब्रह्माण्ड  होती है जिसे बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं फिर भी कुछ नहीं जानते 



माँ की दी चीजों से बतियाती है माँ

रिश्तों की
सिलवटों को खोल
धूप दिखाती है
आँगन में सूखते हैं वो
भीगती है माँ
पेड़ की फुनगी से
उतार कर
घर में बोती है भोर
पर मन के
अँधेरे कोने में
स्वयं बंद होती है माँ
उजाले की
एक- एक किरण
सबके नाम करती है
और साँझ को
आँचल के कोने में
गठिया लेती है माँ
चौखट से अहाते तक
बिखरी होती है
सभी की इच्छाएँ
रात अकेले में
अभिलाषाओं की गठरी
चुपके से खोलती है माँ
रिमोट छीनने की जद्दोजहद
टी वी पर
समाचार का शोर
तेज संगीत की चकाचौंध
इन सबसे अलग
रसोई में
लोकगीत गुनगुनाती है माँ
गैरों के ताने
बरसते हैं
वो भीगती नहीं
अपनों की उपेक्षा
उसे बहा ले जाती हैं
सभी से छुपा के
पोंछती है आँसू
और उठके
काम करने लगती है माँ
होता है समय सभी के पास
पर उसके लिए नहीं
झुर्रियों में
अपना यौवन तलाशने को
खोलती है
दहेज़ का बक्सा
सहलाती है शादी का जोड़ा
माँ की दी चीजों से बतियाती है माँ

Friday, May 6, 2011

 विदेशी धरती का कुछ ऐसा आकर्षण होता है कि एक बार आने के बाद जाना मुश्किल होजाता है .कहते हैं ये पांच सितारा जेल है .फिर भी सभी यहाँ रहना चाहते हैं .पीछे गालियाँ चौबारे बुलाते हैं , याद में सूखते हैं ताल ,नदिया पर  ....


कहो तुम कब आओगे ?


कहो
तुम कब आओगे
अब तो
पानी में सूरज बुझ चुका
बूढ़ा बरगद
चौपाल से कट चुका है
पनघट के
प्यासे-चटके होंठों से टपकता लहू
धूल बन
गलियों-गलियों भटकता रहा
हवाओं में लगी
नफरत की गाँठ खोलने
क्या तुम आओगे
घर में
ईंटें कहतीं, दीवारें सुनती है
पगडण्डी पर ख़ामोशी
सन्नाटे को आगोश में भींचे
सहमी चलती है
चिड़ियाँ भी अब
फुसफुसा के बोलती हैं
क्या तुम आओगे
इस डर की चुप्पी को आवाज देने
या तुम आओगे
बहते हुये
चाँद के पानी में
या ढल के
ओबामा के शब्दों में
भारत-अमेरिका की बातचीत में
फॉरेन रिटर्न का तमगा लिए
सुख-चाशनी की चन्द बूँदे
फटे आँचल में टपकाते
या आओगे तब
जब चूहे कुतुर लेंगे
तुम्हारी अभिलाषाएँ
इंतजार को पूर्ण विराम लगा
करेंगीं चिर विश्राम
बूढी हड्डियाँ
तब आओगे
कहो कब आओगे? 

Wednesday, April 20, 2011

सोचती हूँ यदि दर्द के काँटे न होते तो ये आँसूं कहाँ ठहरते. पीड़ा की नदी वेग से चलती जरुर पर ठिकाने नहीं मिलते. जीवन दर्द के काँटों, पीड़ा की नदी और आँसुओं की गठरी समेटे पथरीली राहों पर चलता  है और फूलों की चाह रखता है . दर्द के इसी जज्बे को शब्दों ने आज पनाह दी है-
 
साँवली  रात
की सिलवटों में
 खोये रहते थे हम
और पहरे पर होता चाँद
खुल चुकी हैं
सिलवटें
अब तो ,
और घायल है चाँद
------------------------------------------
सौप के खुशबू
दर्द  ने
बढाया सदा हौसला मेरा
आज जो मुड के देखा
वो भी
हाथों में कांटे लिए खड़ा था
-----------------------------------------
चाँद
जिसे आगोश में ले
जी भर रो लेती थी
अँगुलियों की झिर्री से
कूद कर बोला
बरसात का मौसम
भाता नहीं मुझे
-------------------------------------
आज फिर
उतरी है
मोहब्बत दरिया में
आज फिर डूबेगा
नाम कोई
कहते हैं
प्यार
करने वालों को
पक्के घड़े
नहीं मिलते
------------------------------
 

Saturday, February 12, 2011

ठण्ड की सिमटी रातों में शब्दों को विस्तार मिलता है और वो भावनाओं के पख लगा उड़ने लगते हैं उन्हीको पकड़कर कविता में ढाल दिया है-
1.
चाहत की गर्मी से
पिघले थे अरमान
और धुंआ
खोहरा बन छा गया था
उसकी कालिख
दिल के दीवारों पर
आज भी दस्तक देती है
2.
हफ्ते भर
घर में बंद रहने के बाद
सूरज ने खिड़की खोली
ठण्ड में  सिकुड़ी एक किरण
पड़ी जो बर्फ पर
स्वयं उसकी आँख चुंधिया गई
वो ढुंढने लगा
एक टुकड़ा बादल
 3.
ठंढा सफ़ेद हवा का झोका
मेरी हड्डियों को
गुदगुदा गया
सुनाई दी एक आवाज तभी
बेटा स्वेटर पहन लो
लग जाएगी ठण्ड
औए मैने जैकेट उठा ली
4.
सर्द कोहरे को ओढ
ठिठुरता  गुलाब
ढूंढ़ रहा था
अपनी महक ,
अलसाई पंखुड़ियों में शबनम
और अपना वजूद
तभी क्रूर हाथों ने
उसे डाली से अलग कर
खोज को विराम देदिया
4.
धुन्ध को ओढ़ मै
कई दिनों से
ढूंढ़ रही थी सूरज को
आकाश के किनारे
एक कराह सुनी
देखा तो सूरज घायल पड़ा था
पूछने पर बोला
तानो और गलियों से ज़ख़्मी हूँ
जो लोगों ने
गर्म मौसम मे दिए थे मुझे
5.
पिछली सर्दी मे
हथेली  की गर्मी
तुम्हारी चौखट पर छोड़ आई थी
आज दस्तानो मे भी
हाथ गर्म नहीं होते
6.
तुम्हारी यादों की सिहरन
जो मुझमे उतरी
ओस मे डूबे गुलाब
तुम्हारे सपनो पर रख आई
उनकी खुशबु से
आज भी मेरी हथेलियाँ महक जाती है
 7.
हमारे रिश्ते की म्रत्यु पर
भिजवाये थे तुमने
कुछ बर्फ के फूल
उन्ही फूलो की कब्र पर
आज धुन्ध  ने पैहरे बैठाएं हैं


Monday, January 17, 2011

स्वयं को जानने के लिए

स्वयं को जानने के लिए
हम देखते हैं
बुजुर्गों की तस्वीरें।
रौब दार मूँछे,
घूँघट की मासूम हँसी
और झुर्रियों की दरारों में
हम ढूँढ़ते हैं
अपनी समानताएँ।
संदूक में
फिनायल गोली के साथ रखे
उनके शादी के जोड़े ,
काली पड़ी जरदोजी की साड़ियाँ,
पीली पगड़ी,
पुराने जेवरों की गठरी।


ये चीजें
हमारी धरोहर बन जाती हैं
इनमें महकती हैं
उनकी गाथाएँ
रीतियाँ,
जो सजाती हैं रंगोली
रोपती हैं आँगन में
तुलसी का बीरा
इनको
वो सौंपते हैं
आने वाली पीढ़ी को।
तीज, त्यौहार,रिश्तों के मौसम
अतीत बुनता है,
उस की एक नाजुक सी डोर
सौंपता है
वर्तमान को
हमारे चारों ओर
फैल जाते हैं संस्कार
और हम धनी हो जाते हैं।


वो बताते हैं
भूख पीढ़े की
घात अपनों की
सही नहीं जाती
उन्होंने सिखाया
सच के पन्ने भूरे हुए
पर अभी भी धडकते हैं
ये गुनगुनी बातें
सर्द परिस्थियों में
लिहाफ बन जाती हैं।


वो कतरा-कतरा
हममें ढलते हैं
शब्द, संस्कार, आकार
और वसीयत बन के
वो मरते नहीं, जब देह त्यागते हैं
अंत होता है उनका,
जब यादों के दरख्तों पर
खिलते है बहुत से फूल
पर उन के नाम का
एक भी नहीं।

अनवरत

कभी कभी मन के सीप में स्नेह का मोती पनपने लगता है और यही उपज  विचारों की लम्बी फेहरिस्त थामे सामने आ खड़ी होती है. तब अनायास की कविता का जन्म होता है-


मै मांगती  हूँ 
तुम्हारी सफलता 
सूरज के उगने से बुझने तक 
करती हूँ 
तुम्हारा इंतजार 
परछाइयों के डूबने तक 
दिल के समंदर में 
उठती लहरों को 
 रहती हूँ थामे 
तुम्हारी आहट तक 
खाने में 
परोस के प्यार 
निहारती हूँ मुख 
 महकते शब्दों के आने तक 
समेटती हूँ  घर 
बिखेरती  हूँ  सपने 
दुलारती  हूँ  फूलों  को 
तुम्हारे  सोने  तक 
रात  को  खीच  कर   
खुद  में  भरती  हूँ  
नींद  के शामियाने में 
 सोती हूँ जग-जग के 
तुम्हारे उठने तक 
इस तरह 
पूरी होती है यात्रा 
प्रार्थना  से  चिन्तन  तक।  

Monday, December 13, 2010



कभी कभी दीप का प्रकाश ह्रदय के अन्धेरों से हार जाता है .आंसू तेल बन भी जलते हैं कभी, पर सुख की आंच नहीं बन पाते-



प्रेम की बाती बन
मै अकेली जलती रही
शब्दों की हवाओं से बची
पर अब वो आंधियां बन चुके हैं
हाथों के घेरों से
हो सके तो
मुझे बचालो
 
माटी के दिए ने सोखा
मोहब्बत का तेल
सुखी बाती भभक के जली
और राख होगई
वो दिए को
उम्मीद के पानी से
सीचना भूल गई थी 

तुम्हारे  प्रेम की
जिस आंच से
जलाया था
उस रोज दिया
वो आंच अब कहीं और महकती है
अब हर बार
दोवाली अँधेरे में बीतती है

Tuesday, July 13, 2010

आँखों में अटका था बस एक ही सपना

अपनी अभिलाषाओं की आहुति दे हमें सुख की चाशनी परोसते  रहे. उनकी आँखों में सपने भी हमारे ही पलते रहे, सूरज की किरण थामी तो हमारे लिए, चांदनी खीच आँगन उतारी तो हमारे लिए और हम दामन फैला उन्हें थाम भी न सके अपनी दुनिया को अपने तक समेट उनकी पहुंच से दूर होते गए. आज ये हर घर की कहानी है. इसी तड़प से उपजी ये कविता-




पहनी
मोची से सिलवाई चप्पल
के दे सके
तेरे पैरों को जूते का आराम
फटी कमीज़ तो चकती लगा ली
ताकि शर्ट तुम्हारी सिल सके
पंचर जुड़ी साईकिल पर चलता रहा
टूटी गद्दी पर 
बांध कपडा काम चलता रहा
ताकि खरीद सके
वो पुरानी मोटर साईकिल तुम्हारे लिए
तागी थी जिस धागे से रजाई
उनकी  उम्र पूरी हुई
रुई भी खिसक के किनारे हुयी
ठंडी रजाई में सिकुड़ता रहा
के गर्मी तुझ तक पहुँचती रहे  
जब भी जला चूल्हा
तेरी ही ख्वाहिशें पकी
उसने खाया तो बस जीने के लिए
जीवन भर की जमा पूंजी
और कमाई नेक नियमति
अर्पित कर
तुझ को समाज में एक जगह दिलाई
पंख लगे और तू उड़ने लगा
ऊँचा उठा तो
पर ये न देखा
के  तेरे पैर उन के कन्धों पर है
उन के चाल की सीवन उधड गई
तेरी रफ़्तार बढती रही
सहारे को हाथ बढाया
तुमने लाठी पकड़ा दी
उनकी धुंधली आँखों से
ओझल  होगया
वो घोली खटिया पर लेटे
धागे से बंधी ऐनक सँभालते
तेरे लौटने की राह देखते रहे
अंतिम यात्रा तक
आँखों में अटका था
बस एक ही सपना
साबुत चप्पल ,नई कमीज़ और एक साईकिल

Thursday, December 10, 2009


कुछ करने का जज्बा जब दिल में हिलोरे मारने लगता है तो सामाजिक परिस्थितियां इन लहरों पर बांध कसने लगती है इन बाधाओं को पार कर कुछ लहरें जो उन्मुक्त बह ,आस दूसरों की छोड़, हरितमा फैलातीं है या कोशिश भी करती हैं तो कुछ तेजाब विचार उन को झुलसा देते हैं.

राम के आने की राह



छोड़ पराई आस
खुद कुछ करने की चाह में
सूरज की खिड़की बंद की
तो तपती धरती को शीतलता मिली
बादल में सेंध लगाई
प्यासे खेतों की प्यास बुझी
नदी की तरंगों को सी दिया
तो डूबे घरों ने साँस लिया
किसान की आशा फली
घर अनाथ होने से बचा
शहरी हवाओं में गांठ लगा दिया
तो बूढ़ा पीपल मुस्कुरा दिया
उन्नति की राह खुली
तो उम्मीदें लौट के घर चलीं
नम हुई बूढ़ी पलकें
ढलती उम्र ने सहारा पाया
मेरे माथे पर
कापतें हाथों ने आशीष सजाया
फैला अपने डैने
मैं जो मौज में उड़ने को था
के कुछ ज़मीनी भगवानों की
 क्षुद्र सोचों ने
क़तर दिए पंख मेरे
आत्मा तक नोच
मेरे उत्साह तो खुरेद डाला
बहुत चला था रामराज्य लाने
कह के धूल में पटक दिया
मैं भी जटायु सा पड़ा धरा पर
राम के आने की राह देखने लगा 

Tuesday, November 17, 2009

शोर

चहुँ और है शोर बहुत
भीतर बाहा हर ओर
तभी सुनाई नही देती
हिमखंड के पिघलने की आवाज़
गाँव के सूखे कुंए की पुकार
धरती में नीचे जाते
जल स्तर की चीख

बटवारा

घर, धन, वृद्ध आश्रम के खर्चे
यहाँ तक कि कुत्ते भी बटें
पर पिता के त्याग ,प्यार
माँ के आँसू ,दूध ,और पीडा
का कुछ मोल न लगा
क्योंकि पुरानी,घिसी चीजों का
कुछ मोल नही होता

Monday, October 5, 2009

वर्षा

वर्षा कुछ यूँ भी आँखों में उतरती है .संग  बहा लाती है कुछ शब्द .उन्हीं को पिरो के बनी है ये कविता


वर्षा दे  जाती है
कुरकुरे गुनगुने से सपने
कुछ पुरानी गीली यादों के
वर्षा जलाती है 
मन में स्नेह दीप
गर्माहट इसकी
देह में उर्जा का संचार करती है
अभिलाषा
तुम्हारी  निगाहों के छुअन की
बलवती हो जाती है
वर्षा देती है जन्म
एक अमर प्रेम को
बूंद - धरती ,पात - हरितमा
बिजली और बादल
के प्रणय की साक्षी होती है
वर्षा बरसती है घर में
धो देती है काजल
आंसुओं में घुल
नमकीन हो जाती है
वर्षा
भर देती है नदी ,
कच्चे घडे और प्रेम के बीच 
डुबो देती हैं उन्हें
चिर जीवित करने के लिए
वर्षा दे जाती है
कुरकुरे गुनगुने से सपने
पर नींद छीन लेती है

बारिश के ये दिन

जीवन में जो चीज हमसे दूर हो सदा उसकी कमी खलती है. बारिश, जो भारत में  साथ थी, यहाँ भी है पर दोनों में  बहुत अंतर है. बूंदों के संगीत पर थिरकने, सूरज की बादल संग आँख मिचौली देखने के पल अब हमारी हथेली में बंद नहीं है. पता नहीं समय हमारे साथ बह रहा है या मै समय के साथ पर एक क्षण को भी जो अतीत में झांक पाती हूँ ऐसा ही कुछ याद आता है-

उफ़ बारिश के ये दिन
पानी में  कश्ती बहाने
छपाक से दूसरो को भिगाने
रेन कोट पहने के सुन्दर बहाने 
छतरी लगा के इतराने के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
जब छत पर भीगा करते थे
बूंदों के संग अठकेलियाँ  कर
गीत नया गया करते थे
माँ कि डांट कि भी
कहाँ परवाह किया करतें थे
वो बेफिक्री के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
बारिश कि पहली फुहार से
उठती थी माटी कि खुशबु 
पूरी गलियां महक उठतीं
पत्ती पत्ती डाली डाली सजती
मन में  बसी है आज भी वो खुशबु
वो नरम गरम से दिन
उफ़ वो बारिश के दिन
रिमझिम फुहार के बाद
ठेले पर भुट्टे भुनवाना
भीगते हुए उनको खाना
याद है आज भी वो सोंधा  स्वाद
वो स्वादों के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
घिरते थे जो मेघ
मन में  सोचा करते थे
बरसे उमड़ घुमड़ इतना
के आजाये सड़कों पर पानी इतना
हो जाये रेनी डे 
 दुआं यही  माँगा करते थे
वो छुट्टी पाने के दिन 
उफ़ वो बारिश के दिन
रात में  बदल कि गड गड़ से
जब हम बहने डर जाया करते थे
पकड़ के एक दुसरे को
माँ को  बुलाया करते थे
वो माँ के संग सोने के दिन
उफ़ ये बारिश दिन
बारिश में जब जाती थी बिजली
टटोलते टटोलते मचिश , मोमबत्ती ढूँढा करते थे
फिर सारा घर इकठा होके
उस पिली हलकी रौशनी में
हंसते हंसते खाते और खाते खाते हंसते थे 
 फुर्सत के लम्हे पकड़
अन्ताक्षरी   खेला करते थे
वो अपनेपन के दिन
उफ़ ये बारिश के दिन
न वो सोंधी खुशबु है न माँ का साथ
न डर में  पकड़ने को बहन का हाथ
बरखा में  भीगने का समय भी अब कहाँ है
सब कुछ तो है यहाँ पर वो सुख कहाँ है
फुर्सत के पल भी नहीं,बूंदों को पकड़ने कि तम्मना भी नहीं
फिर भी है आज बारिश के दिन

Sunday, October 4, 2009

प्यार को जो देख पाते

भैया
काश तुम समझ पाते
पापा की झिड़कियों मे था
तुम्हारा ही भला
उनके गुस्से मे छुपे
प्यार को जो देख पाते
तो शायद
तुम घर छोड़ के नही जाते
पापा के ठहाकों से
जो गूंजता था घर कभी
आज उनकी
बोली को तरस जाता है
तुम्हारे कमरे मे
बैठे न जाने क्या
देखते रहते हैं
अकेले मे कई बार
बाते करते हैं
पापा अब बुझ से गए हैं
उनकी डाट को
गांठ बाँध लिया
पर न देखा की
तुम्हारी सफलता को
मेरे बेटे ने किया है
बेटे को मिला है
कह के
सब को कई बार बताते थे
तुम्हारे सोने के बाद
तुम्हें कई बार
झाक आते थे
क्यों नही
देखा तुम ने
के खीर पापा कभी
पूरी कटोरी नही खाते थे
तुम्हारी पसंद के
फल लाने
कितनी दूर जाते थे
आपने वेतन पे लिया कर्ज
तुम्हारी मोटर साईकिल लाने को
काम के बाद भी किया काम
तुम्हें मुझे ऊँची शिक्षा दिलाने को
तुमने उन्हें दिया
मधुमेह ,उच्च रक्तचाप ,
छुप के रोती
आंखों को मोतिया
लेली उनकी मुस्कान
उनकी बातें
उनका गर्व से उठा सर
और सम्मान
यदि तुम ये सब जानते
तो शायद नही जाते
आजो
इस से पहले
के कंही देर न हो जाए
पितृ दिवस पे तो पिता को
बेटे का उपहार दे जाओ
तुम आजो

Friday, October 2, 2009

भारत

भारत दो हिस्से में जीता है
एक हिस्से में
बड़ी बड़ी कोठियां है
व्यापारी, नेताओं, अभिनेताओं की
एक हिस्से में
झुग्गी झोपडियां
फुटपाथ पे सोते लोग
एक घर की आस में
जीवन जीता मध्यमवर्गीय इन्सान
एक हिस्से में
शान्ति दूत गाँधी के शब्द
तो दूजे में
गोधरा अहमदाबाद दंगों से
विश्व मानचित्र पे
शर्मिंदा भारत
एक हिस्से में
लाल बत्ती पे रुकी कार में
पिज्जा चाकलेट खाते बच्चे हैं
तो एक हिस्से में
हाथ में कपड़ा ले
गाड़ी पोछते
ललचाई निगाहों से देखते
भूखे बच्चे
एक हिस्से में
ऐश्वर्या शुश्मिता
विश्व में जाना पहचाना नाम
एक हिस्से में
लुटी अबरू
दहेज़ में जलती बेटियाँ
और
कोख में मार दी जाती बच्चियां

Monday, September 28, 2009

विस्फोट

दर्द चीखा
लहू बहा
शहर काँपा
दुनिया के नक्शे पे
भारत थरथराया
राम हुआ शर्मिंदा
रहीम ने सर झुकाया



2.

लाशों की भीड़ में
खड़ी
माँ भारती रो रही
चिता जलाऊँ किस के लिए
बनाऊँ कब्र किसकी
मानव मानवता
धर्म धार्मिकता
देश देशभक्ति
है कौन यहाँ
हुई हो न मौत जिसकी


शरद ऋतू

ग्रीष्म में तपते
साये ,जलते मन
सुलगती हवाएं
शरद ऋतू के आगमन पे
हर्षित हो जायें
गुलाबी ठण्ड की
आहट लिए
प्रकृति का करता सिंगार
शरद ऋतू की सुषमा
है शब्दों से पार
श्वेत नील अम्बर तले
नव कोपलें फूटती है
कमल कुमुदनियों
की जुगल बंदी से
मधुर रागनी छिड़ती है
भास्कर की मध्यम तपिश
सुधा बरसाती चांदनी
धरती के कण कण में
प्रेम रस छलकाती है
मौसम की ये अंगडाई
विरह प्रेमियों के ह्रदय में
टीस सी उठाती है

Sunday, September 27, 2009

गिलहरी की बात

वो छोटी अमेरिकन गिलहरी
हमारे देश की
गिलहरियों से अलग
मोटी ताजी
स्वतंत्र ,भय मुक्त
इक्क्षाओं से भरी
बार बार पेड़ से उतरती
कागज़ उठाती
जतन से मुहँ में दबाती
पेड़ पे बने घोसले में
रख आती
समाप्त हुए कागज़
घुमाई दृष्टि इधर उधर
देखा
थे दूसरे पेड़ के नीचे कुछ
झबरीली पूंछ हिलती
दौडी उस को उठाने को
उसी पेड़ से उतर
गिलहरी दूसरी
आई इसे भागने को
ये आती
वो भागती
मैं देख रही थी तमाशा सब
अचानक सुना मैने
ये गिलहरी बोली
क्यों भगा रही हो मुझे
क्या तुम को भी है लगी
हवा भारत की
जो मै एक क्षेत्र से
क्षेत्र दूसरे जा सकती नही
सुन के शर्मसार हुई मै
चली गई गिलहरी
कागज उठा के
और मै सर झुका के

बेटी होने की खुशी


बेटी होने की खुशी
अब सिर्फ़
वेश्याएँ मनाएँगी
समाज के ठेकेदारों के घर
बेटियाँ कोख मे
दफ़न कर दी जाएँगी
काश!
गर्भ का अंधकार छोड़
वो दुनिया का उजाला देख पाती

खामोशी

आवाज़ मिलती है अंदाज मिलता नहीं
दूर तक राहों में चिराग कोई जलता नहीं    
पानी में है शोले और हवाएं नफरत की
फूल चाहत का अब कोई खिलता नहीं
कुरेद्तें है ज़ख्म हरा करने को
चाक   जिगर अब कोई सिलता नहीं
उस बस्ती में इतजार का है मतलब क्या
लाख चीखने पर भी दरवाजा जहाँ खुलता नहीं
कुछ यूँ बेनूर हुए है गाँव हमारे
के पत्ता भी अब कहीं खिलता नहीं
देती रही  माँ देर तक आवाजें उस को
जाने वाला कभी रुकता नहीं  नहीं

Monday, January 5, 2009

दुआ

सूखे से तरसी आंखों ने
मांगी दुआ वर्षा की
पानी बरसा और बरसता ही चलागया
सब कुछ बहा गया
कुछ यूँ कबूल होती है
दुआ गरीबों की

दीवाली

कहा उस ने
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
अपने संग होने की
खुशियों में समायें
आओ प्रिये दीवाली मनाएं
हाथ पकड़
दिए के पास लाई
जलाने को जो उसने लौ उठाई
तभी देखा
दूर एक घर
अंधेरों में डूबा था
बम के धमाके से
ये भी तो थरराया था
आँगन में उनके
करुण क्रन्दन का साया था
पड़ोस डूबा हो जब अन्धकार में
तो घर हम अपना कैसे सजाएँ
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं?
कर के हिम्मत उसने
एक फुलझडी थमाई
लाल बत्ती पे गाड़ी पोछते
उस मासूम की
पथराई ऑंखें याद आई
याचना के बदले मिला तिरस्कार
पैसों के बदले दुत्कार
घर में जब गर्मी न हो
वो पटाखे कैसे जलाये
जब है खाली उसके हाथ
हम फुल्झडियां कैसे छुडाएं ?
तुम ही कहो प्रिये
दीवाली हम कैसे मनाएं ?
जब खाया नही
तो दूध कहांसे आए
छाती से चिपकाये बच्चे को
सोच रही थी भूखी माँ
मिठाइयों की महक से
हो रही थी और भूखी माँ
खाली हो जब पेट अपनों के
कोई तब जेवना कैसे जेवे
अब तुम ही कहो प्रिये
दिवाली हम कैसे मनाएं?
भरी आँखों से
देखा उसने
फ़िर लिए कुछ दिए ,पटाखे मिठाइयां
संग ले मुझको
झोपडियों की बस्ती में गई
हमारी आहट से ही
नयन दीप जल उठे
पपडी पड़े होठ मुस्काए
सिकुड़ती आंतों को
आस बन्धी
अंधियारों में डूबा बच्पन
आशा की किरण से दमक उठा
अमावस की काली रात में
जब प्रसन्नता की दामिनी चमक उठी
तो अब आओ प्रिये
दीवाली हम खुशी से मनाये
सुनो न
दीवाली हम सदा एसे मनाएं

Friday, January 2, 2009

जिन्दगी यूँ ही चलती है

जीवन अपनों का सजाना तो है
रेत में ही सही पर घर बनाना तो है

हाँ मालुम है के तूफान का अन्देशा है
मौजों में कश्ती फ़िर भी बहाना तो है

भूख के आगे पलट जाते हैं हर एक तूफान
इस बात का ख़ुद को यकीं दिलाना तो है

हर सीप में मोती मिलता नही दोस्तों
सुना हमने भी ये फ़साना तो है

समां गए कितने लहरों में उस रोज
उजडे इस चमन को फ़िर से बसाना तो है

भूखे रह जायें या सो जायें वो पीके पानी
क़र्ज़ बनिए का फ़िर भी चुकाना तो है

बहुत रो लिए तुम सुन के दास्ताँ मेरी
तेरे इन आसुंओं को अब हँसाना तो है

समुन्दर न सही समुन्दर सा हौसला तो दे
ज़िन्दगी से रिश्ता हम को निभाना तो है

सब कुछ खो के बुत सा बैठा है वो
घाव बन न जाए नासूर उस को रुलाना तो है

Thursday, January 1, 2009

महंगाई

विरोधी नेता
माल दबा दाम बढाते हैं
इसी की सीधी चढ़
सत्ता में आते हैं
गद्दी पे बैठ
बहुत मंहगे हो जाते हैं
महंगाई से दीखते है चहुँ ओर
पर आम जनता की पहुँच से
दूर हो जाते हैं

महंगाई सब को
सरे आम लूटती है
पर रपट इसकी
किसी थाने में
नही लिखी जाती है
इसी लिए शायद
ये बेखौफ बढती जाती है

एक गरीब माँ
बच्चों को
फल के नाम बता रही थी
खरीद सकती नही
इसी लिए
दूर से दिखारही थी

महंगाई स्वयं महंगी हुई
पर रिश्ते सस्ते हो गए
गिरा दाम इमान का
जज्बात नीलाम हो गए
सस्ती बिकने लगी हैं बातें
जान इन्सान की सस्ती होगी
कम हुई कीमत किसानों की
बचा आत्महत्या की केवल रास्ता है
इस मंहगाई के दौर में लोगों
ये ही तो है जो सस्ता है

Saturday, November 15, 2008

समीकरण

माँ पिता पालते हैं
चार बच्चे खुशी से
पर चार बच्चों पे
माँ पिता भारी है
ये कलयुग का समीकरण है

Thursday, November 13, 2008

देश

बदलना चाहो भी तो बदल न पाओगे ज़माने को
बैठे हैं भेष बदल दरिन्दे कोशिश मिटाने को।

बाणों से बिंधा देश है कब से चीख रहा
कोई तो दे दे सहारा मेरे इस सिरहाने को।

सही न गई जब भूख अपने बच्चों की
हो गई खड़ी बाज़ार में ख़ुद ही बिक जाने को।

बूढी आँखें राह तक तक के हार गईं
लौटा न घर कभी गया विदेश जो कमाने को।

विधवा माँ की भूख दवा उम्मीद है जो
कहते हैं क्यों सभी उसे ही पढाने को।

नन्ही उँगलियाँ चलाती है कारखाने जिनके
छेड़ी उन्होंने ही मुहीम बाल मजदूरी हटाने को।

अपनो ने किया दफन गर्भ में ही उस को
तो क्या जो वो चीखती रही बाहर आने को।

Wednesday, November 5, 2008

पुनर्जन्म

जब भी मैं आइना देखती हूँ
चेहरे पर वक़्त की छाया देखती हूँ
गालों की इन लकीरों में छुपी
समय की गर्द को धीरे से छूती हूँ
उसे हटाने की नाकाम कोशिश करती हूँ
और बहुत दुखी होती हूँ

उम्र से लड़ते लड़ते मै हार गई
और सिलवटें चेहरे पर अपना घर बना गई
कुमारी से श्रीमती और श्रीमती से माँ के सफ़र में
मैं तो कहीं खो ही गई
अचानक
माँ माँ की आवाज़ से सोच टूटी मेरी
बेटी जो घुटनों तक आती थी
आज ऊँगली पकड़ बुलाती थी मेरी
व़क्त जो चेहरे पर झुर्रियाँ बना रहा था
वही मेरे ज़िगर के टुकडों की उमर भी बढ़ा रहा था
नन्ही हथेलियाँ अपनी लकीरें बना रहा थी
पर एक माँ के माथे पर
गर्व की एक और गाथा भी गा रही थी
इन्हे बड़ा होते देखने में जो खुशियाँ हैं
माँ के लिए तो वही उसकी सारी दुनिया है
मासूम आखों के आईने में
अपने खोये समय को देखती हूँ
छोटी होती हूँ, जवान होती हूँ और उमर दराज़ हो जाती हूँ
फिर से आइना देखती हूँ चेहरे की इन लकीरों को देखती हूँ
पर अब में खुश होती हूँ
क्योंकि इन रेखाओं में
अपनी आत्मा, अपने बच्चों को बड़ा होती देखती हूँ

Wednesday, October 1, 2008

गरीब

बाबा क्यों बैठे हो उदास और हताश
दुनिया से या ज़िन्दगी से हो निराश
किसी से नही मै मौसम से हूँ बेजार
निगोड़े की वजह से ज़िन्दगी हो गई तार तार
जब चाहिए पानी बरसता ही नही
बरसता है तो फ़िर रुकता ही नही
सूखे और बाढ़ के कहर से
टूटी है कमर कुछ इस कदर
रस्सी बेचने निकला हूँ इधर
सुबह से हो गई शाम
बोहनी तक तो हुई नही
नायलोन के आगे
सन की रस्सी कोई खरीदता ही नही
बाबा दर्द तुम्हारा जानती हूँ
पर एक खुशी की बात बताती हूँ
हमने चंद्र यान भिजा है चाँद पे
भारत सब को बता रहा है शान से
चलो बढ़िया है
मुला इस से होगा क्या
क्या समय से पानी बरसेगा
भूख से कोई न तरसेगा
क्या हमरे बिटवा की होसकेगी पढ़ाई
बिटिया हमरी जायेगी ब्याही
बाबू की खासी को मिल सकेगा आराम
सब हाथों को मिल सकेगा काम
हमरी धन्नो की का होसकेगी दवाई
अम्मा को का देने लगेगा दिखाई
चुका पाएंगे क्या हम महाजन का क़र्ज़
कुकुर और हम में नही है कौनो फर्क
मेरे पास इन बातों का न था कोई जवाब
करा के उस की बोहनी
उठ गई वहां से चुप चाप

Sunday, April 27, 2008

अमेरिका में माँ

अमेरिका में माँ



माँये जब कुछ अलग करना चाहती हैं
तो आँखे हमारी क्यो आश्चर्य से भर जाती हैं

उधरते रिश्तों की सिवन को ,
चुप चाप सीती जाती है ..
कर्तव्य करती जीवन भर ,
अधिकारों का कब सोचती है.
सब की खुशियों के लीये स्वयं कांटो पे चलती है .
पर छालो पे अपने जब वो मरहम लगाती है
तो आँखें हमारी क्यो आश्चर्य से भर ाती हैं.

तो क्या जो पानी मे थोड़ा सा खेल लिया
बड़े से झूले पे जी भर के झूल लिया
सब के लिया जीती रही जीवन भर
तो क्या आज जो कुछ पल अपने लिए जी लिया
औरों की कही करती रही सदा
आज अपनी कही जो करना चाहती है
तो आँखें हमारी क्यो आश्चर्य से भर जाती हैं.

कभी सिन्दूर कभी ममता की कसौटी पे कसी जाती है.
पलके झुका हर पीडा सह जाती है
आंसू अपने सब से छुपाती है
और सदा मुस्कुराती है
आज यदि हमे वो आपनी चाहते बताती है
तो आँखे हमारी क्यों आश्चर्य से भर जाती हैं

माँ सहनशीलता की मूर्ती कही जाती है
सहते सहते मूर्ती ही हो जाती है
मन मे उसके कंही एक बंद कोना है
ये कोा ही शायद उसका अपना होना है
छुपी इसमे एक छोटी सी बच्ची
जब चुपके से झांकती है
आँखे हमारी क्यों आश्चर्य से भर जाती है

माँ जब यहाँ से चली जाती है
थोड़ा यहाँ भी रह जाती है
आपनी हँसी महक यंही छोर जाती है
उसके बनाये बेसन के लडू जब मै खाती हूँ
माँ याद बुत याद आती है
तब आँखे हमारी आश्चर्य से नही आंसू से भर जाती हैं


Monday, January 14, 2008

ग़ज़ल

कुर्वत इतनी न हो के वो फासला बढ़ाये
मसर्रत का रिश्ता दर्द में न तब्दील हो जाये

जाना है हम को मालूम है फिर भी
ख्वाहिश ये के चलो आशियाँ बनायें

खुली न खिड़की न खुला दरवाजा कोई
मदद के लिए वहां बहुत देर हम चिल्लाये

रूह छलनी जिस्म घायल हो जहाँ
जशन उस शहर मे कोई कैसे मनाये

लुटती आबरू का तमाशा देखा सबने
वख्ते गवाही बने धृतराषटृ जुबान पे ताले लगाये

चूल्हा जलने से भी डरते हैं यहाँ के लोग
के भड़के एक चिंगारी और शोला न बन जाये

धो न सके यूँ भी पाप हम अपना दोस्तों
गंगा में बहुत देर मल-मल के हम नहाये